कारगिल दिवस: अधूरे वादों, उपेक्षित मां बापों, विधवाओं और बदहाल स्मारकों का स्मृति दिवस


वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध से लेकर अब तक 21 साल मे क्या हमारे उत्तराखंड के शहीद जवान जांबाजों के निशां पर क्या वाकई ऊपर लिखे शेर की तरह ही जश्न मनाया जा रहा है ! या फिर कई स्मारकों स्मृतियों का नामोनिशान ही मिट गया है !! कारगिल में शहीद हुए अपने जवान बेटे पिथौरागढ़ निवासी कुंदन सिंह खड़ायत की प्रतिमा से लिपटी मां की आंखों से फूटे जज्बात के समंदर को जरा अपनी आंखों से महसूस करने की कोशिश कीजिए ! कैसा लगा !!


आंसू-उपेक्षा-और उत्तराखंड


वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में अपने जवान 20-22 साल के इकलौते बेटे को माथा चूम कर विदा करने करने वाली कितनी मांएं आज अकेले अपने बेटों की तस्वीरों के सामने बैठकर धोती के पल्लू से अपनी आंखें पोंछ रही होंगी !


शहादत का कैसा सम्मान


कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 जवानों ने शहादत दी थी और 37 जवान तो ऐसे थे, जिन्हें युद्ध के बाद वीरता पुरस्कार के लिए नवाजा गया था। हमारे समाज और सरकार ने आज इन शहीदों मे से कितने घरों की सुध लेने को अपना सरोकार समझा होगा ! सरकारों ने भले ही शहीदों से किए अपने वायदों को भुला दिया हो, लेकिन उत्तराखंड में शहादत का जज्बा आज भी वही है।


बस बेटे की यादों का सहारा


शादी के 10 दिन बाद ही अपने इकलौते बेटे विजय सिंह भंडारी को खो देने वाली विधवा रामचंदरी आज भी अपनी बेटे के शहीद द्वार की मरम्मत अपने पैसे से करती है। बेटे की पेंशन के 20% हिस्से पर गुजर करने वाली मां आज भी उस टूटे स्मारक को बनाने के लिए सरकार की राह तक रही है, जो देहरादून के प्रेम नगर में 2 साल पहले अतिक्रमण अभियान के दौरान टूट गया था। प्रेम नगर में अतिक्रमण से हटाई गई दुकानें भले आज दोबारा से उन्ही स्थानों पर सज गई हैं, नहीं सजा है तो इनके शहीद बेटे विजय भंडारी का स्मारक ! ऐसे पता नहीं कितने स्मारक और सिलापट आज धूल धूसरित होकर अपना नामोनिशान तक मिटा चुके हैं !


कई वादे हैं जो अधूरे ही रह गए


शहीद परिवारों को मकान के लिए प्लॉट या 5 बीघा कृषि भूमि जिलाधिकारियों ने आवंटित करनी थी। तब से देहरादून में तमाम नेताओं और पहुंच वालों को सैकड़ों बीघा भूमि फ्री में आवंटित कर दी गई, लेकिन शहीदों के परिवारों से सरकार के किये वादे निभाने के लिए जमीनें कम पड़ गई। शहीद के घरों से जोड़ने वाले संपर्क मार्गो,नजदीकी शिक्षण संस्थाओं का नामकरण शहीदों के नाम से होना था।



लेकिन राजनीतिक पार्टियों को नामकरण करते समय अपने स्वर्गीय आकाओं के नाम के आगे शहीदों का नाम शायद बहुत तुच्छ लगता है। शहीदों के आश्रितों को निशुल्क दवा और इलाज शहीदों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा जैसे वादे तो मात्र चुनावी वादे की तरह ही तभी भुला दिए गए थे। बड़ोवाला प्रेम नगर में अपने 22 साल के बेटे सुरेंद्र सिंह को कारगिल में बलिदान कर देने वाली मां गोमती देवी 21 साल से प्रेम नगर में बनाए गए स्मारक की रोज खुद ही साफ सफाई करती है।


 


सैन्य परिवारों की सरकार से उम्मीद


 


उत्तराखंड सरकार से इन शहीदों के परिवार और इनकी शहादत पर गर्व करने वाले उत्तराखंड के लोग इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि आज जब यह सरकार मीडिया के दफ्तरों में कारगिल शहीदों को श्रद्धांजलि देने वाली प्रेस विज्ञप्ति भिजवाए तो उस प्रेस विज्ञप्ति में कम से कम दो-तीन वायदे तो ऐसे हों जो इस सरकार के बचे हुए डेढ़ साल के कार्यकाल से पहले-पहले पूरे हो जाएं ! वही भाजपा सरकार की इन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि समझी जाएगी।


 


कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के वीर जवान


 


● महावीर चक्र विजेता- मेजर विवेक गुप्ता, मेजर राजेश अधिकारी।


● वीरचक्र विजेता- कश्मीर सिंह, बृजमोहन सिंह, अनुसूया प्रसाद, कुलदीप सिंह, एके सिन्हा, खुशीमन गुरुंग, शशिभूषण घिल्डियाल, रुपेश प्रधान व राजेश शाह।


● सेना मेडल विजेता- मोहन सिंह, टीबी क्षेत्री, हरि बहादुर, नरपाल सिंह, देवेंद्र प्रसाद, जगत सिंह, सुरमान सिंह, डबल सिंह, चंदन सिंह, मोहन सिंह, किशन सिंह, शिव सिंह, सुरेंद्र सिंह और संजय।


● मैंस इन डिस्पैच- राम सिंह, हरिसिंह थापा, देवेंद्र सिंह, विक्रम सिंह, मान सिंह, मंगत सिंह, बलवंत सिंह, अमित डबराल, प्रवीण कश्यप, अर्जुन सेन, अनिल कुमार।