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त्रिपुरा हिंसा : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकार को दो हफ्ते के भीतर जवाब देने के दिए निर्देश

    नई दिल्‍ली /   सुप्रीम कोर्ट त्रिपुरा में हाल ही में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले में राज्य पुलिस की कथित मिली-भगत और निष्क्रियता के आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति डीवाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने सरकारों को दो हफ्ते के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है।  अधिवक्ता ई. हाशमी की ओर से दाखिल याचिका पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पैरवी की। उन्‍होंने सर्वोच्‍च अदालत से कहा कि वे हालिया साम्प्रदायिक दंगों की स्वतंत्र जांच चाहते हैं। इस मामले में अब दो हफ्ते बाद सुनवाई होगी। भूषण ने कहा कि सर्वोच्‍च अदालत के समक्ष त्रिपुरा के कई मामले लंबित हैं। पत्रकारों पर यूएपीए के आरोप लगाए गए हैं। यही नहीं कुछ वकीलों को नोटिस भेजा गया है। पुलिस ने हिंसा के मामले में कोई एफआइआर दर्ज नहीं की है। ऐसे में अदालत की निगरानी में इसकी जांच एक स्वतंत्र समिति से कराई जानी चाहिए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की प्रति केंद्रीय एजेंसी और

पुलिस कस्टडी में पिछले 20 साल में हुई 1888 मौतें, इन मामलों में दोषी सिर्फ 26 पुलिसकर्मी

 


 भारत में पुलिस कस्टडी में रखे गए लोगों की मौतों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसे लेकर आधिकारिक डेटा में जो बातें सामने आई हैं, वो काफी चौंकाने वाली हैं। दरअसल, पिछले 20 साल में देशभर में कस्टडी में रहने के दौरान 1888 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, अगर इन मौतों पर कार्रवाई के आंकड़ों को देखा जाए, तो सामने आता है कि 20 साल में सिर्फ 26 पुलिसकर्मियों को ही कस्टडी में हुई मौतों के लिए दोषी पाया गया।गौरतलब है कि कस्टडी में हुई मौतों का सिलसिला अब यूपी में भी बढ़ता देखा जा रहा है। 

जहां कुछ ही दिन पहले कासगंज में अल्ताफ नाम के युवक की पुलिस हिरासत में मौत हुई थी। वहीं, मंगलवार को कानपुर में चोरी के शक में हिरासत में लिए गए शख्स की अस्पताल से जाते वक्त जान चली गई। आरोप है कि पुलिसवालों ने उसे कस्टडी में इतना मारा था कि उसकी मौत हो गई। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 20 साल में कस्टडी में जितने लोगों की जान गई है, उनमें से 893 मामलों में पुलिसकर्मियों पर केस दायर किए गए। इस दौरान 358 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट भी पेश हुई। लेकिन महज 26 पुलिसवालों पर ही कस्टडी में हुई मौतों की जिम्मेदारी तय की जा सकी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 20 साल में कस्टडी में रहे जिन 1888 लोगों की मौत हुई, उनमें से 1185 लोगों को 'रिमांड मे नहीं रखा' दिखाया गया।

 कस्टडी में हुई सिर्फ 703 मौतों को ही रिमांड के दौरान जान गंवाने की कैटेगरी में दर्शाया गया है। इसका साफ मतलब है कि पिछले 20 साल में कस्टडी में रखे गए जितने लोगों की मौत हुई, उनमें से 60 फीसदी को मौत से पहले एक भी बार कोर्ट में पेश तक नहीं किया गया था। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े के मुताबिक, पिछले साल यानी 2020 में देशभर में कस्टडी में 76 मौतें हुईं। राज्यों में इसके लिए सबसे ऊपर गुजरात का नाम है, जहां कस्टडी में रखे गए 15 लोगों की जान गई। मृतकों में किसी पर भी दोष साबित नहीं हुए थे। एनसीआरबी के डेटा में यह भी बताया गया है कि पिछले चार सालों में कस्टडी में हुई मौतों के लिए 96 पुलिसकर्मी गिरफ्तार हुए हैं। लेकिन उन पर दोष साबित नहीं हुए। 



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