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देहरादून: नाबालिग के साथ बाल वनिता आश्रम में दुष्कर्म, तबीयत खराब होने पर चला पता

    देहरादून /    राजधानी देहरादून के तिलक रोड स्थित बाल वनिता आश्रम में एक नाबालिग से दुष्कर्म का मामला सामने आया है। दुष्कर्म का आरोपित भी आश्रम में ही रहता है। शहर कोतवाली पुलिस ने आश्रम के प्रधान की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया है। आश्रम में निराश्रित और हर तरफ से ठुकराए बच्चे रहते हैं। इस समय आश्रम में करीब 50 बालक और बालिकाएं रह रही हैं। आश्रम में बालक और बालिकाओं के अलग-अलग हास्टल हैं, लेकिन खाना दोनों का एक साथ ही होता। बताया जा रहा है कि इसी दौरान बालक और बालिका के बीच नजदीकियां बढ़ गई और बालक ने बालिका के साथ दुष्कर्म किया। कुछ दिन पहले ही बालिका की तबीयत खराब हुई थी तो उसने इसकी शिकायत होस्टल वार्डन से की।बालिका से पूछताछ की गई तो उसने बताया कि आश्रम में रहने वाले एक बालक ने उसके साथ दुष्कर्म किया। बालिका का मेडिकल करवाया जा रहा है। बालिका के गर्भवती होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इसकी पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट आने की बाद ही हो सकेगी। Sources:JNN

हाईकोर्ट: पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ समेत सात जिलों के जिलाधिकारी जवाब-तलब

 


उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तरकाशी और उत्तराखंड के दूसरे वनों में रह रहे वनगुर्जरों को वनों से हटाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायालय सरकार की तरफ से दायर शपथपत्र से सन्तुष्ट नही हुआ।

न्यायालय ने मामले को सुनने के बाद अगली सुनवाई हेतु 24 नवम्बर को तय की है। न्यायालय ने नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रमुख सचिव, समाज कल्याण, पी.सी.सी.एफ. वाइल्ड लाइफ के अलावा नैनीताल, उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी के जिलाधिकारियों को व्यग्तिगत रूप से 24 नवम्बर को न्यायालय में विस्तृत रिपोर्ट के साथ उपस्थित होने को कहा है।जिसमे कहा गया है कि, उत्तरकाशी जनपद में लगभग 150 वनगूर्जरों व उनके मवेशियों को गोविन्द पशु विहार राष्ट्रीय पार्क में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है, जिससे वनर्गूजर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। मवेशी भूख से मर रहे हैं।

न्यायालय ने पूर्व में इसे मौलिक अधिकारों का हनन बताते हुए उत्तरकाशी के जिलाधिकारी व उद्यान उप निदेशक कोमल सिंह को निर्देश दिये थे कि, वह सभी वनगूर्जरों के लिये आवास, खाने-पीने के साथ दवाई की व्यवस्था करे और उनके मवेशियों के लिये भी चारे की व्यवस्था कर उसकी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करें।

याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि, उत्तराखंड के जंगलों में लगभग 10 हजार से अधिक वन गुर्जर पिछले 150 साल से निवास करते आये है। अब सरकार उनको वनों से हटा रही है, जिसके कारण उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है और उनको अपने हकहकूकों से भी वंचित होना पड़ रहा है। उनको वनों से विस्थापित नही किया जाय।

पूर्व में न्यायालय ने जिलाधिकारी उत्तरकाशी और राज्य सरकार को निर्देश दिये थे कि, वनगूर्जरों के लिये आवास व खाने पीने की सुविधा के साथ-साथ उनके मवेशियों के लिये भी चारे की व्यवस्था करे और सरकार उनके विस्थापन के लिए दोबारा से एक कमेटी का गठन कर उसकी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करें।

आज मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश आर.एस.चैहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ में हुई। मामले के अनुसार थिंक एक्ट राइज फाउंडेशन के सदस्य अर्जुन कसाना और हिलामयन युवा ग्रामीण रामनगर की ओर से इस मामले में जनहित याचिका दायर की गई है

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