गंगा में तैरती लाशें और ताली बजाते मेरे जैसे जाहिल भारतीय-नरेश भरद्वाज

भारत विरोधी TV Channels ने रोते हँसते कहा, ये देखो इतनी मौतें हो रही हैं और परिजनो के पास शब का दाह संस्कार करने को रुपए नही हैं इसलिए नादियों में बहा रहे हैं. बिपक्ष ने भी किन्नरों की तरह ताली बजाते हुए इसको नमक मिर्च लगा जनता को परोसा और जनता ने भी यक़ीन कर लिया और शुरू हो गया सियारों की हुआ हुआ हुआ का चिलमपो. क्यूँ हुआ और क्या ये सत्य है? इसलिए हुआ की हम आज तक इतिहास तो ग़लत पढ़ ही रहे हैं, संस्कार भी भूल गए हैं. मैं अपने सर्व जाती धर्म के लोगों से याद दिलाते हुए सवाल करना चाहता हूँ :- १) कितनो ने अपने स्वजनो/परिजनों के पार्थिव शरीर का इस तरह अपमान किया? २) हिन्दू चिता को शांत होने तक घर वापस नही आते. तो फिर ये कौन से ग़रीब थे, जिन्होंने स्वजनों के शब को मुखाग्नि नही दी? इंसानियत इतनी भी नही मरी की ग़रीब को ऐसे समय मदद ना करें. शोर मचाने वालों ने ही हिन्दू को कंधा देते मुस्लिम भाइयों की तस्वीर सोसियल मीडिया पर दिखाई, मतलब इंसानियत ज़िंदा है अभी. ३) हमारे मुस्लिम समाज में शव को दफ़नाया जाता है तो क्या यह माना जाय की क़ब्र खोदने के लिये चार भाई भी नही जुट पाये? ४) गंगा में तैरते शव भगवा वस्त्रों में क्यूँ लिपटे थे? ५) सिर्फ़ उतर प्रदेश से ही ऐंसी तस्वीरें क्यूँ? चुनाव नज़दीक हैं इसलिए. हमें कोंग्रेस और वामपंथियों का इतिहास पढ़ना पड़ेगा की कैसे निजी स्वार्थ के लिए इन्होंने राष्ट्र की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया है. अब इनकी देखा देखी पूरा बिपक्ष भी इनके रास्ते पर चल पड़ा है. आज वक़्त की ज़रूरत है राष्ट्र विरोधी ताक़तों और उनकी राष्ट्र को तोड़ने की साज़िश को समझने की. ख़ैर, किसान आंदोलन भी तो एक साजिस ही है जिसे केंद्र सरकार नही समझ पा रही तो हम तो आम जनता हैं. Sources:Naresh Bharadwaj on Whatsapp