आरएसएस की बैठक: संवाद और सौहार्द का नया अध्याय
(सलीम रज़ा पत्रकार)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की आम बैठक और उसमें दिए गए संदेश को केवल वर्तमान परिप्रेक्ष्य से समझना अधूरा होगा। इस संगठन की यात्रा लगभग एक सदी पुरानी है, और उसके उतार-चढ़ाव, विवाद और योगदान भारतीय समाज की बदलती परिस्थितियों का दर्पण भी रहे हैं। जब संघ अपनी शताब्दी की ओर अग्रसर है, तब उसके संदेश और उसके स्वर में जो बदलाव दिखाई देता है, वह अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है।
आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, और समाज के भीतर जातीय, सांप्रदायिक और सांस्कृतिक विभाजन गहरे थे। हेडगेवार ने संगठन के माध्यम से आत्मबल, अनुशासन और राष्ट्रवाद की भावना जगाने का प्रयास किया। यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में संघ का दायरा सीमित था, किंतु समय के साथ उसने देशभर में अपना नेटवर्क खड़ा कर लिया। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान संघ पर यह आरोप भी लगा कि उसने सीधे राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, बल्कि समाज संगठन पर केंद्रित रहा।
आज़ादी के बाद के दशकों में संघ की यात्रा आसान नहीं रही। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया। यह प्रतिबंध तभी हट सका जब संघ ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में काम करने का वचन दिया। इसके बाद से संघ ने धीरे-धीरे शिक्षा, सामाजिक कार्य और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए अपनी पैठ गहरी की। जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में राजनीतिक क्षेत्र में भी उसकी विचारधारा का प्रभाव दिखने लगा।
मगर संघ की आलोचना भी बराबर होती रही। खासकर अल्पसंख्यक समाज में यह धारणा बनी रही कि संघ सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देता है। कई अवसरों पर सांप्रदायिक दंगों और तनाव की घटनाओं में संघ पर आरोप लगे। यही वह संदर्भ है जिसमें मौजूदा समय में संघ की बैठकों से निकलने वाले संदेश का महत्व और बढ़ जाता है। जब संघ कहता है कि वह हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थन करता है, या फिर जब जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठन उसकी बातों को सकारात्मक ढंग से ले रहे हैं, तो यह भारतीय राजनीति और समाज के लिए एक नए संवाद की शुरुआत का संकेत देता है।
वर्तमान बैठक और उसमें प्रस्तुत प्रस्ताव में यह स्पष्ट झलकता है कि संघ अब अपने सौ साल पूरे होने के अवसर पर राष्ट्र को एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण देना चाहता है। वह यह बताना चाहता है कि उसका उद्देश्य केवल किसी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करना नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की विविधता को स्वीकार करते हुए ‘राष्ट्र प्रथम’ की अवधारणा को पुष्ट करना है। यह बात ऐतिहासिक दृष्टि से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंध पिछले सौ वर्षों से राजनीतिक खींचतान और सांप्रदायिक घटनाओं से लगातार प्रभावित होते रहे हैं।
यदि इस बैठक के संदेश को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखा जाए तो यह भारतीय समाज के लिए एक अवसर की तरह है। आज़ादी के बाद के सात दशकों में कई बार अवसर आए जब समाज ने साम्प्रदायिक खाइयों को पाटने की कोशिश की, परंतु राजनीतिक स्वार्थों और अविश्वास ने उन प्रयासों को अधूरा छोड़ दिया। आज जब भारत वैश्विक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है और अपनी सांस्कृतिक विरासत को विश्व मंच पर प्रस्तुत कर रहा है, तब आंतरिक एकता और सामाजिक सौहार्द सबसे बड़ी आवश्यकता है।
संघ की यह पहल केवल एक संगठन का वक्तव्य नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज को एक दर्पण दिखाती है कि यदि सद्भाव और संवाद को प्राथमिकता दी जाए तो विवाद और टकराव अपने आप पीछे छूट जाते हैं। यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है। संघ की ओर से आने वाला यह संदेश इसी विविधता को स्वीकारने और उसे राष्ट्रीय शक्ति में बदलने का प्रयास है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो आरएसएस की आम बैठक का संदेश केवल वर्तमान राजनीति या सांप्रदायिक संबंधों की चर्चा भर नहीं है। यह बीते सौ वर्षों की यात्रा, उतार-चढ़ाव और संघर्षों का निष्कर्ष है। यह ऐसा क्षण है जब इतिहास हमें अवसर दे रहा है कि हम आपसी अविश्वास को पीछे छोड़कर एक साझा भविष्य की ओर बढ़ें। यदि यह संदेश समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और उस पर अमल हो, तो यह केवल संघ की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की जीत होगी।
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