सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Featured Post

त्रिपुरा हिंसा : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकार को दो हफ्ते के भीतर जवाब देने के दिए निर्देश

    नई दिल्‍ली /   सुप्रीम कोर्ट त्रिपुरा में हाल ही में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले में राज्य पुलिस की कथित मिली-भगत और निष्क्रियता के आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति डीवाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने सरकारों को दो हफ्ते के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है।  अधिवक्ता ई. हाशमी की ओर से दाखिल याचिका पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पैरवी की। उन्‍होंने सर्वोच्‍च अदालत से कहा कि वे हालिया साम्प्रदायिक दंगों की स्वतंत्र जांच चाहते हैं। इस मामले में अब दो हफ्ते बाद सुनवाई होगी। भूषण ने कहा कि सर्वोच्‍च अदालत के समक्ष त्रिपुरा के कई मामले लंबित हैं। पत्रकारों पर यूएपीए के आरोप लगाए गए हैं। यही नहीं कुछ वकीलों को नोटिस भेजा गया है। पुलिस ने हिंसा के मामले में कोई एफआइआर दर्ज नहीं की है। ऐसे में अदालत की निगरानी में इसकी जांच एक स्वतंत्र समिति से कराई जानी चाहिए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की प्रति केंद्रीय एजेंसी और

उर्दू दिवस- सियासत के चाबुक से कराहती उर्दू




 मशहूर शायर इकबाल का जन्मदिन यानी उर्दू का दिन बड़े जोशो खरोश के साथ 9 नवंबर को मनाया जाता है. लेकिन अफसोस की बात यह है कि उर्दू का दायरा जिस तरह से बढ़ना चाहिए था वह बढ़ने के बजाय बहुत ज्यादा सिमटता जा रहा है और वह दिन दूर नहीं कि जब चंद लोग ही उर्दू के चाहने वाले रह जाएंगे. दरअसल इसकी वजह यह है कि उर्दू को सियासत ने एक अलग ही रंग दे दिया है. इसी को ध्यान में रखते हुए किसी शायर ने क्या खूब कहा

अपनी उर्दू तो मोहब्बत की ज़बां थी प्यारे
अब सियासत ने उसे जोड़ दिया मज़हब से


ऐसा नहीं है कि उर्दू के लिए कुछ नहीं किया जाता लेकिन जिस जज़्बे और जोश के साथ उर्दू के लिए कार्य करना चाहिए उसका अभाव नजर आता है.
कुछ लोग उर्दू में चंद ग़ज़लें लिखकर उर्दू के प्रति अपना दायित्व पूरा समझ लेते हैं तो कुछ लोग कुछ किताबें इधर से उधर नक़ल करके लिखकर उर्दू के प्रति समझते हैं कि हमने अपना कर्तव्य निभा लिया है.

दरअसल यही उर्दू की बदहाली की बड़ी वजह है.


हर साल उर्दू दिवस पर खूब बड़े-बड़े प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं और खूब शोर शराबा होता है एक दूसरे को सम्मानित करने का भी चलन आजकल खूब चल रहा है लेकिन जो बुनियादी तौर पर उर्दू के लिए काम होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है. उर्दू के नाम पर मंच सजा कर सरकार को उर्दू के लिए जिम्मेदार ठहराने से कुछ होने वाला नहीं है बल्कि उर्दू के लिए जो जिम्मेदारी बनती है उसको जब तक नहीं निभाया जाएगा तब तक कुछ भी नहीं होगा. एक ओर उर्दू के नाम पर मंच सजाया जाता है तो दूसरी तरफ़ उर्दू की हालत कितनी दयनीय हो चुकी है इसका पता इसी से लगाया जा सकता है कि अभी कुछ दिन पहले एक त्योहार पर जारी विज्ञापन में एक कंपनी ने कुछ लाइनें उर्दू में लिख दी तो उस पर खूब हंगामा हुआ और फिर उसको मजबूरी में वह लाइनें जो उर्दू में लिखी/कही गई थी वह हटानी पड़ी. 

इससे बड़ी उर्दू की बदहाली कुछ और नहीं हो सकती है.हर साल उर्दू दिवस पर खूब बड़े-बड़े प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं और खूब शोर शराबा होता है एक दूसरे को सम्मानित करने का भी चलन आजकल खूब चल रहा है लेकिन जो बुनियादी तौर पर उर्दू के लिए काम होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है. उर्दू के नाम पर मंच सजा कर सरकार को उर्दू के लिए जिम्मेदार ठहराने से कुछ होने वाला नहीं है बल्कि उर्दू के लिए जो जिम्मेदारी बनती है उसको जब तक नहीं निभाया जाएगा तब तक कुछ भी नहीं होगा. एक ओर उर्दू के नाम पर मंच सजाया जाता है तो दूसरी तरफ़ उर्दू की हालत कितनी दयनीय हो चुकी है इसका पता इसी से लगाया जा सकता है कि अभी कुछ दिन पहले एक त्योहार पर जारी विज्ञापन में एक कंपनी ने कुछ लाइनें उर्दू में लिख दी तो उस पर खूब हंगामा हुआ और फिर उसको मजबूरी में वह लाइनें जो उर्दू में लिखी/कही गई थी वह हटानी पड़ी. इससे बड़ी उर्दू की बदहाली कुछ और नहीं हो सकती है.


               दरअसल सियासत उर्दू को अपना लिबास पहनाने की पूरी कोशिश कर रही है और इसमें वो काफी हद तक कामयाब भी हो चुकी है. यही वजह है कि उर्दू को अब एक खास मज़हब से जोड़कर देखा जाने लगा है. उर्दू वाले अगर आरंभ से ही इसके लिए दिल से मेहनत करते तो शायद उर्दू की आज ये हालत नहीं होती. आज उर्दू अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है.


Sources: Golden Times
           

टिप्पणियाँ

Popular Post