कोरोना से लड़ाई- वैज्ञानिकों की ‘चेतावनी’ और ‘सुझावों’ पर भारी पड़ी सियासत, ‘सलाहकारों’ से मुंह मोड़ना नए जोखिम का संकेत

  


 कोरोना से जंग के बीच भारत के वरिष्ठ वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील द्वारा 'कोविड जीनोम निगरानी परियोजना' के वैज्ञानिक सलाहकार समूह के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद एक नई बहस छिड़ गई है। विपक्ष द्वारा यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या 'कोरोना' से जंग में वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और दूसरे सलाहकारों की बात नहीं सुनी जा रही है। क्या वैज्ञानिकों की 'चेतावनी और सुझावों' पर सियासत भारी पड़ने लगी है। आपदा के इस दौर में 'सलाहकारों' से मुंह मोड़ना एक नए जोखिम का संकेत हो सकता है। केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है, वैक्सीन को लेकर जो रोजाना नए आदेश जारी हो रहे हैं, उसके पीछे एक बड़ा कारण सियासत भी रहा है। केंद्र सरकार को समय रहते कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर, उसके विभिन्न वैरिएंट्स और पूर्ण वैक्सीन प्रोग्राम आदि के बारे में सुझाव दे दिए गए थे। इसके बावजूद दूसरी लहर की भीषण त्रासदी को नहीं रोका जा सका।
कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी पिछले दिनों यह सवाल उठाया था कि केंद्र सरकार सलाहकारों की बात नहीं सुन रही है। उन्होंने पूछा था, केंद्र के 'अधिकार-प्राप्त समूह' और कोविड के लिए बनाई गई राष्ट्रीय टॉस्क फोर्स द्वारा जो सुझाव दिए गए थे, उनका क्या हुआ। क्या किसी ने उन पर अमल किया है। टास्क फोर्स ने कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आने की चेतावनी थी, मगर इसके बावजूद केंद्र सरकार उसका मुकाबला करने में नाकाम रही। वैज्ञानिक सलाहकारों के अलावा भारत सरकार के 'अधिकार प्राप्त समूहों' ने जो रणनीति तैयार की थी, उसके तहत सरकार के पास संसाधन जुटाने के लिए छह महीने का समय था। इस अवधि में मेडिकल मैनपावर, दवाओं का इंतजाम करना, आईसीयू बेड, ऑक्सीजन का उत्पादन और सप्लाई के लिए पर्याप्त कंटेनर जुटाना, जैसे काम पूरे हो सकते थे।

विपक्षी नेताओं ने कोरोना से जंग के दौरान केंद्र सरकार पर कई तरह के सवाल उठाए हैं। इनमें दो-तीन सवाल अहम हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अदार पूनावाला को कथित रूप धमकियां दी गईं। वे इन धमकियों से बचने के लिए ब्रिटेन चले गए। हालांकि अदार पूनावाला ने कहा है कि वह कुछ दिनों में लौट आएंगे। पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) ऑक्सफोर्ड/ एस्ट्राजेनेका के कोविड-19 टीके 'कोविशील्ड' का उत्पादन कर रहा है। केंद्र ने इस मामले में चुप्पी साध ली।

दूसरा, वैक्सीन को लेकर वैज्ञानिकों ने केंद्र को सलाह दी थी कि जितना जल्दी हो सके, देश में तय आयु सीमा वाले सभी लोगों को वैक्सीन लग जाए। कांग्रेस पार्टी के नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, सरकार ने पहले तो चार-पांच सप्ताह बाद कोरोना से बचाव वाली वैक्सीन की दूसरी डोज देने की बात कही। उसके बाद वह अवधि चार से छह सप्ताह तक बढ़ा दी गई। अब कहा जा रहा है कि 12 सप्ताह बाद कोविशील्ड का अच्छा असर होगा। इससे जनता असमंजस में है। लोग पूछ रहे हैं कि ये डाटा इतनी जल्दी-जल्दी कौन बदल रहा है।
वरिष्ठ वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील ने अपने लेख में कहा था 'भारत में वैज्ञानिक, साक्ष्य आधारित नीति निर्धारण में एक अड़ियल रवैये का सामना कर रहे हैं'। केवल उनके मामले में ही नहीं, बल्कि कई बातों को लेकर केंद्र सरकार ने सलाहकारों की बात पर गौर नहीं किया। सीक्वेंसिंग के डाटा के मुताबिक, जिस वैरिएंट ने कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर को त्रासदी के रुप में बदला है, वह 'B.1.617' है। दिसंबर 2020 में इसके लक्षण देखे गए थे। इसका कारण बताया गया कि भीड़भरे कार्यक्रमों की वजह से यह वैरिएंट रफ्तार पकड़ सकता है। इसके बावजूद सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया। इतना ही नहीं, कुंभ आयोजन और पांच राज्यों में चुनाव भी करा दिए गए। भारत में फैले संक्रमण का कारण इसी वैरियंट को माना जा रहा है। डब्लूएचओ ने भी B.1.617 वैरिएंट को लेकर चिंता जताई थी। भारत के वैज्ञानिक सलाहकारों ने यह भी बताया कि यह वैरिएंट मूल वायरस B.1 वैरिएंट के मुकाबले ज्यादा वायरस पैदा करता है। मरीज के फेफड़ों को इससे भारी नुकसान पहुंचता है। आज वही हो रहा है।
सलाहकारों ने बता दिया था कि दूसरी लहर बहुत भयानक होगी। उसमें रोजाना कोरोना के चार से छह लाख मरीज सामने आ सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन के स्टडी ग्रुप ने कहा था कि मई के मध्य में कोरोना की पीक होगा। मरीजों की संख्या दस लाख तक जा सकती है। टेस्टिंग की कछुआ गति से काम नहीं चलेगा। वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी भी दे दी कि भारत में टेस्ट पॉजिटिविटी रेट, 22 फीसदी से अधिक है। उत्तराखड़ में यह रेट 36.5 रहा है तो गोवा में 46.3 था। उन्होंने कहा, वैक्सीन के जरिए कोरोना संक्रमण के केसों में कमी लाई जा सकती है। कोरोना की दूसरी लहर आई तब भारत में 2.4 फीसदी लोगों को ही वैक्सीन लगाई गई थी। इसमें केवल पहली डोज शामिल थी। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र ने कथित तौर पर अपनी मनमर्जी से एक मई को 18 साल से ऊपर वालों के लिए वैक्सीनेशन कार्यक्रम आरंभ करने की घोषणा कर दी। इससे राज्यों में आपाधापी मच गई। वैक्सीन की मांग पूरी करने के लिए राज्यों को ग्लोबल टेंडर देने पड़ गए। केंद्र सरकार को कथित तौर पर इसके चलते वैक्सीन की दूसरी डोज लगाने के समय में कई बार परिवर्तन करना पड़ा।
वैज्ञानिकों की टीम ने सरकार को दिसंबर में ही यह सलाह दे दी थी कि आगे कोरोना की दूसरी लहर अपना कहर बरपा सकती है। इस चेतावनी का सरकार पर कोई असर नहीं दिखा। वैक्सीन का निर्माण होने के बाद सरकार का जो रवैया देखने को मिला, वह इतना बताने के लिए काफी था कि जैसे भारत ने कोरोना संक्रमण पर विजय हासिल कर ली है। उसी वक्त वैज्ञानिकों ने चेताया था कि सरकार को अभी से मेडिकल सुविधाएं जुटाने के लिए तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। पर्याप्त संख्या में अस्पताल और मेडिकल स्टाफ का इंतजाम किया जाए। वैक्सीन का वितरण ऐसा हो कि भारत की बड़ी आबादी उसके दायरे में शामिल हो। स्वास्थ्य उपकरण एवं ऑक्सीजन सप्लाई की चेन को दुरुस्त किया जा सकता था।

कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी को लिखे अपने पत्र में कहा था, आपकी सरकार के पास एक स्पष्ट, सुसंगत कोविड और टीकाकरण नीति के अभाव एवं ऐसे समय में जब यह बीमारी तेजी से फैल रही थी, उस हालत में, समय से पहले अपनी जीत का डंका बजाना, इसने भारत को एक बहुत ही खतरनाक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। आज यह बीमारी विस्फोटक रूप से बढ़ रही है। वर्तमान में यह स्थिति हमारे सिस्टम पर भारी पड़ने के कगार पर है।

Sources:AmarUjala