स्मृति शेष .......यादों और प्रेरणाओं में हमेशा जिंदा रहेंगे राकेश खंडूड़ी

 



(सलीम रज़ा पत्रकार)

“अब कौन लिखेगा सच्चाई बेख़ौफ़ लफ़्ज़ों में,
वो कलम ही टूट गई जो ज़मीर की बात करती थी।”

यह पंक्तियां बृहस्पतिवार की सुबह अमर उजाला के स्टेट ब्यूरो चीफ राकेश खंडूड़ी के निधन की खबर सुनकर हर किसी के दिल में गूंज उठीं। पत्रकारिता जगत के लिए यह दिन किसी काली सुबह से कम नहीं रहा। जैसे ही यह खबर फैली, हर आंख नम हो गई, हर चेहरा गमगीन था। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि सच्चाई को बेखौफ़ शब्दों में ढालने वाले, पत्रकारिता को पेशा नहीं बल्कि मिशन मानने वाले और सबके प्रिय खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं रहे।

राकेश खंडूड़ी का जीवन और उनका व्यक्तित्व पत्रकारिता के आदर्श स्वरूप की जीवंत मिसाल था। वे सिर्फ खबर लिखने वाले पत्रकार नहीं थे, बल्कि समाज की नब्ज़ पकड़ने वाले, जनता की पीड़ा को समझने वाले और उसे आवाज़ देने वाले एक सच्चे प्रहरी थे। उनकी रिपोर्टिंग में गांव की धूल से लेकर शहर की चमक तक, किसान के संघर्ष से लेकर युवा की बेकारी तक और आम आदमी की परेशानी से लेकर सत्ता के गलियारों तक—हर पहलू की झलक मिलती थी।

उनकी कलम का सबसे बड़ा गुण था उसका साहस। वे सत्ता, तंत्र और दबावों से कभी नहीं डरे। उनके लेख और रिपोर्टिंग इस बात का प्रमाण थे कि पत्रकारिता का पहला और अंतिम कर्तव्य जनता के पक्ष में खड़ा होना है। उनकी कलम उन मुद्दों को उजागर करती थी, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा अनदेखा कर देती थी। यही कारण था कि पाठक, सहयोगी और समाज के लोग उन पर गहरा विश्वास करते थे।

खंडूड़ी का व्यक्तित्व भी उनकी पत्रकारिता जितना ही बड़ा था। वे सरल, सहज और मिलनसार स्वभाव के धनी थे। वे अपने सहयोगियों को हमेशा प्रेरित करते और नए पत्रकारों का मार्गदर्शन करने में कभी पीछे नहीं हटते। चाहे कोई छोटा रिपोर्टर हो या कोई वरिष्ठ अधिकारी—वे सबके लिए समान रूप से उपलब्ध रहते थे। उनके जीवन का यह गुण उन्हें न केवल एक बेहतरीन पत्रकार बल्कि एक बेहतरीन इंसान भी बनाता था।

उनकी विदाई ने न सिर्फ अमर उजाला परिवार को, बल्कि पूरे उत्तराखंड और हिंदी पत्रकारिता जगत को गहरा आघात पहुँचाया है। उनके सहयोगियों का कहना है कि राकेश खंडूड़ी का जाना पत्रकारिता की दुनिया में ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। वे उस दौर के प्रतिनिधि थे जब पत्रकारिता को ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाता था और जब खबर को खबर की तरह प्रस्तुत करना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती थी।

सुबह से शाम तक सोशल मीडिया, दफ्तरों और परिचितों की महफ़िलों में सिर्फ खंडूड़ी जी की यादें ही थीं। कोई उनके साथ बिताए पल साझा कर रहा था, कोई उनकी प्रेरणादायी बातें याद कर रहा था तो कोई उनके मार्गदर्शन और सहयोग के लिए आभार जता रहा था। श्रद्धांजलि संदेशों की बाढ़ सी आ गई और हर संदेश में एक ही भाव था—“खंडूड़ी जी जैसे लोग बार-बार नहीं आते।”

उनके जाने से यह एहसास और गहरा हो गया है कि आज जब पत्रकारिता कई बार व्यावसायिक दबावों, शोर-शराबे और दिखावे में उलझ जाती है, खंडूड़ी जैसे पत्रकार का होना कितना जरूरी है। वे पत्रकारिता के उस रूप के प्रतीक बन गए हैं, जो सच को सच कहने का साहस रखता है। उनके लेख, उनकी सोच और उनकी शैली आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का काम करती रहेंगी।

राकेश खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी ईमानदार लेखनी और उनका समर्पित व्यक्तित्व हमेशा जीवित रहेगा। उनका जाना अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनकी स्मृतियां आने वाले पत्रकारों और समाज दोनों को यह सिखाती रहेंगी कि पत्रकारिता का असली अर्थ क्या होता है।

उनकी याद में यही कहा जा सकता है—

“सफर अधूरा छोड़ गया वो कलम का सिपाही,
मगर उसकी लिखी हर पंक्ति आज भी सांस ले रही है।”

भावपूर्ण श्रद्धांजलि

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