उत्तराखण्ड: भाजपा की अन्दुरूनी रार कहीं भाजपा को न पड़ जाये भारी

 


  उत्तराखंड में चुनावी चौसर सजने चुकी है। प्रदेश में सत्ता पर आसीन भाजपा व मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनो ही जोर आजमाईश में लगी हुई हैं। एक मसल है सूत न कपास जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा यानि मौजूदा दौर में भाजपा व कांग्रेस दोनों ही ऐसे हालातों से जूझ रहे हैं। आलम ये है कि दोनों ही पार्टियों में वाक्य यु;द्ध चल रहा है। लेकिन गौर करने लायक बात ये है कि एक.दूसरे को घेरने में लगी दोनो ही पार्टियां पार्टियां अपने कुनबे के अन्दर की रार शांत करने की नाकाम कोशिशों में भी हैं। दोनो ही राजनीतिक पार्टियां इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि अगर वक्त रहते अन्दुरूनी रार शांत न हुई तो चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि उन सीटों पर अंदरूनी रार का निर्णायक असर पड़ सकता है जहां जीत.हार का अन्तर 500.1000 वोटों का था। सांगठनिक दृष्टि से बेहतर भाजपा में अंदरूनी लड़ाई की नुमाइश देख कांग्रेस अपने अन्दर कुनबे में चल रही रार को मामूली मान रही है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा के पास सरकार के अलावा मजबूत संगठन भी है। पार्टी के पास मुख्यमंत्री समेत बारह मंत्रियों की टीम, पांच पूर्व मुख्यमंत्री, 56 सिटिंग विधायक,पांच लोकसभा सदस्य और दो राज्यसभा सदस्य की लम्बी चौड़ी टीम के साथ पंचायतों व निकायों के लोग भी है। पार्टी का प्रांत से लेकर मंडल तक सक्रिय संगठन व आनुषांगिक संगठनों का ढांचा है। बराबर अन्तराल पर होने वाले अधिवेशन,बैठकें और कार्यशालाएं होती हैं। संगठन के राष्ट्रीय नेताओं से नियमित व नियोजित संवाद भी भाजपा की सांगठनिक कार्यशैली में शामिल है। संघ के समर्पित स्वयंसेवकों का स्वाभाविक सहयोग भी भाजपा की ताकत रही है। इतना सब होने के बावजूद भाजपा को अपने ही कई दिग्गज असहज कर रहे हैं। यूं तो बड़े संगठनों में सामान्य तौर पर होने वाली खींचतान को सामान्य रूप से ही लिया जाता है व सुलझा भी लिया जाता है। बावजूद इसके चुनाव से ठीक पहले सार्वजनिक तौर पर भिड़ रहे भाजपा के छोटे-बड़े नेता किसी खतरे का संकेत तो नहीं दे रहे, यह चिंता पार्टी के बड़ों को बेचैन किए हुए है। हाल में ही प्रदेश के चुनाव प्रभारी एवं केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने देहरादून में पार्टी संगठन की कई चरणों में बैठकें लीं। बैठकों में उन्होंने भी मौजूदा खींचतान पर चिंता जताई व इस खेल में शामिल बड़ों को चेतावनी भी दी। गौरतलब है कि जिस समय जोशी पार्टी के ऐसे तत्वों को चेतावनी दे रहे थे,उसी समय वरिष्ठ मंत्री डा. हरक सिंह भी पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर चोट कर रहे थे। पार्टी के इन दो बड़े नेताओं की जुबानी जंग ने भाजपा के लिए खासी मुश्किल खड़ी कर दी है। श्रम मंत्री हरक सिंह रावत के खिलाफ कर्मकार कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष शमशेर सिंह सत्याल ने भी त्रिवेंद्र की शह पर खुल कर मोर्चा खोला हुआ है। अब यह लड़ाई हाई कोर्ट तक जा पहुंची है। इधर पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस से भाजपा में आने वाली विधायकों की जमात के कुछ विधायक व मंत्रियों ने हरक सिंह के साथ एकजुटता दिखाई है। इस एकजुटता को खतरनाक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा प्रदेश में भाजपा के कई विधायकों व मंत्रियों के खिलाफ पार्टी के अंदर ही बयानबाजी हो रही है। इस तरह की बयानबाजी को पार्टी के ऐसे नेताओं का समर्थन प्राप्त है, जिन्हें लगता है कि सिटिंग विधायक के टिकट कटने पर उनकी किस्मत का ताला खुल सकता है।
भाजपा में मौजूदा  खींचतान का अहसास पुराने और समझदार पार्टी नेताओं ने तब ही कर लिया था जब पार्टी ने कांग्रेस विधायकों को उनकी शर्तो के साथ भाजपा में शामिल कर लिया था। इन शर्तो के तहत आधी कैबिनेट सीटें कांग्रेस मूल के भाजपाइयों की झोली में गईं व कुल नौ विधायक सीटें भी उनको समर्पित हुईं। इस तरह वर्षो से भाजपा के लिए काम कर रहे नेता हाथ मलते रह गए व भाजपा को कोसने वाले सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हो गए। जिनकी तब सुनी नहीं गई वे अब कह रहे हैं यह तो होना ही था।
?भाजपा में अंदरखाने चल रही खींचतान को देखकर खुश हो रही कांग्रेस अपने दल के अंदर चल रही कलह को मामूली आंक रही है। हरीश रावत को प्रदेश कांग्रेस में बड़ा चेहरा होने के कारण मुख्यमंत्री का स्वाभाविक दावेदार भी माना जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपने खास को बिठाने व स्वयं को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने में कामयाब रहे रावत ने दल के भीतर चल रही लड़ाई का प्रथम दौर तो जीत ही लिया है। इस जीत ने पार्टी में उनके विरोधियों को और ज्यादा सक्रिय व मुखर कर दिया है। रावत समर्थक व विरोधियों की लड़ाई गाहे.बगाहे प्रदर्शित होती रहती है। इसके अलावा राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर टिकट के दावेदारों ने भी एक.दूसरे के पर काटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जैसे.जैसे प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ेंगी वैसे.वैसे कांग्रेस का अंतर्कलह भी परवान चढ़ता जाएगा। भाजपा में तो अंतर्कलह को थामने का सांगठनिक मैकेनिज्म है,लेकिन कांग्रेस में अरसे से इसकी कमी खल रही है।


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