क़ुर्बानी और इस्लाम

 

     सलीम रज़ा / /



आज भी हो जो इब्राहिम सा ईमाँ पैदा !
आग कर सकती है अंदाजे गुलिस्ताँ पैदा !!

दुर्रे मंसूर की एक रिवायत में है कि आप सल्लल्लाहो अलैहै वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि अल्लाह के नज़दीक कोई दिन अशर ए जिलहिज्जा से अफजल नहीं है ! और न ही किसी दिन मेँ अमल करना इसमें अमल करने से अफजल नहीं है ! पस खुसूसियत से इन दिनों में लाइलाह इल्लल्लाहो और अल्लाहो अक़बरक्री कसरत रखो ! क्योंकि तकबीरो तहलील और ज़िक़रूल्लाह के यह दिन है ।हज़रते सहाब-ए-किराम ने अर्ज किया जिहादे फी सबीलिल्लाह भी नहीं ! आपने इरशाद फ़रमाया हाँ जिहादे फी सबीलिल्लाह भी नहीं ! अलबत्ता ये कि कोई भी अपनी जानो माल लेकर अल्लाह के रास्ते में चला जाए और फिर वापस न हो । (मिरकात शरीफ़)हजरत नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहै वसल्लम का इरशादे पाक है ! कि जो शख्स ईद और बक़र ईद की रातों में तलबे सवाब के लिए बेदार रहा हो ! उसका दिल उस दिन न मरेगा ! जिस दिन सब दिल मरेंगे !जो शख्स वुस्सअत के बाबजूद कुरबानी न करे ऐसे शख्स के लिए हदीसे पाक में बडी सख्त वईद आईं है ! जिसे पढकर या सुनकर एक मुसलमान का दिल लरज़ जाता है ! चुनांचे आँ हज़रत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पाक इरशाद है कि जिसने वुसअत रखते हुए कुरबानी नहीं की पस वह हमारे पास न आए दूर ही रहे।

 (साभार)


सभी को ईइ-उल-अज़हा की दिली मुबारकबाद। वैसे तो इस्लाम में क़ुर्बानी का ज़िक्र आदम अलैह सलाम के ज़माने से मिलता है लेकिन इस्लाम में बुनियादी तौर पर क़ुर्बानी हज़रत इब्राहिम अलैह सलाम के ज़माने से है जब उन्होंने अपने बेटे को क़ुर्बान करने की कोशिश करी थी तो अल्लाह तबारक ताला ने उनके बेटे के बदले एक जानवर की क़ुर्बानी ली। तब से अपनी जान की क़ुर्बानी के निशानी के तौर पर हर साल क़ुर्बानी दी जाती है। हज़रते इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने जुलहज की आठवीं रात एक ख्वाब देखा जिस में कोई कहने वाला कह रहा है  के अल्लाह की राह में अपनी प्यारी चीज कुर्बान करो आपने सुबह को अपनी सारी दौलत अल्लाह की राह में  खर्च कर दी लेकिन नवी रात फिर वही ख्वाब देखा और दसवीं रात फिर वही ख्वाब देखने के बाद आप अलैहिस सलातु वस्सलाम  समझ गये कि सबसे प्यारा तो मुुझे मेरा बेटा है और आपने  अपने  बेटे की क़ुरबानी का पक्का इरादा फरमा लिया जिस की वजह से ज़ुल्हज को यौमुन्नहर यानि ज़बह का दिन कहा जाता हैं । इस्लाम शब्द के मायने ही यही हैं कि अल्लाह की इच्छा को पूरा करना और उसे हज़रत इब्राहिम अलैह सलाम ज्यादा कोई भी साबित नहीं कर सकता इसीलिए अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम अलैह सलात को खलीलुल्लाह के खिताब से नवाज़ा। ज़िक्र है कि बेवीलोन में बुतों की पूजा होती थी तब हज़रत इब्रहीम अलैह सलाम ने उन्हें चुनौती दी थी तब वहां के राजा नमरूद ने हज़रत इब्राहिम अलैह सलाम के हाथ बांधकर भट्टी में डाल दिया था उस वक्त वहां पर एक फरिश्ता ज़ाहिर हुआ और उसने दरयाफ्त किया कि अगर हज़रत इब्रहिम अलैह सलाम उनसे मदद लें तो वो तैयार है लेकिन हज़रत इब्राहिम अलैह सलाम ने कहा कि उनके लिए अल्लाह ही काफी है, इतना कहते ही भट्टी के दहकते कोयले की जगह फूल की पखुंड़िया बन गईं। गरज ये रही कि बादशाह नमरूद के ज़ुल्मो सितम की वजह से हज़रत इब्राहिम अलैह सलाम अपनी जोज़ा सरहा के साथ बेवीलोन छोड़कर कनान जो अब फिलिस्तीन और इजरायल का पुराना नाम था वहां चले गये। धीरे-धीरे वक्त गुज़रता गया और दोनो ही बुजुर्ग हो गये गरज ये कि उनकी उम्र अब ऐसी न रही कि उन्हें औलाद जैसी चीज मिल सके औलाद न होने का ग़म दोनों को था आखिरकार सरहा ने अपनी दासी हजीरा को आगे रखकर हज़रत इब्रहिम से औलाद के सुख की इल्तज़ा की कुछ अर्सा गुजरने के बाद हजीरा को औलाद हुई और उसका नाम इस्माईल रखा गया। ज़िक्र है कि हजीरा  के औलाद होने के बाद सरहा ने हज़रत इब्रहिम से हजीरा को रेगिस्तान में छोड़कर आने को कहा, हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह से दरख्वास्त की तब अल्लाह ने हजीरा को सरहा से दूर ले जाने की का हुक्म दिया। हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह से पूछा कि वो कहां ले जायें तब फिर अल्लाह ने हुक्म दिया कि हजीरा को मक्का ले जाओं गरज ये कि हज़रत इब्रहिम हजीरा और बेटे इस्माईल के साथ साफा और मारवाह के पहाड़ों के बीच बसे मक्का शहर ले गये। जिक्र है कि दुनिया में अल्लाह ने सबसे पहले मक्का को बनाया था इस बीच अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम का कई मर्तबा इम्तेहान लिया और हर मर्तबा हज़रत इबा्रहिम अल्लाह के लिए गये इम्तेहान में अव्वल आये। एक बार हज़रत इबा्रहिम को अल्लाह का हुक्म हुआ कि वह मक्का छोड़कर कनान चले जायें, अल्लाह का हुक्म मानकर हज़रत इब्रहिम अलैह सलाम हजीरा और इस्माईल को मक्का में छोड़कर कनान चले गये। एब बार इस्माईल को शिद्दत की प्यास लगी और हजीरा पानी खोजने साफा और मारवाह की पहाड़ियों के बीच सात बार चक्कर लगाती रहीं तभी अल्लाह की तरफ से मोजजा हुआ और मौसम बदल गया और बारिश होने लगी,पानी हद से ज्यादा बरसने लगा आखिरकार मां की गभेलन लौटने लगी और हजीरा चिल्लाईं जम-जम और बारिश रूक गई तभी से इस मौसम को जम-जम और पानी को अमृत कहा जाता है। अखिर दस साल बाद हज़रत इ्रब्राहिम मक्का लौटे लेकिन मौसम बदलने से अब मक्का आबाद हो चुका था। इस दौरान हज़रत इबा्रहिम नेेे अल्लाह से कोई भी सवाल नहीं किया अल्लाह का जैसा-जैसा हुक्म मिलता रहा हज़रत इबा्रहिम वैसा-वैसा करते गये। एक बार अल्लाह ने उनका सख्त इम्तेहान लेते हुये ख्वाब में कहा कि वो अपने बेटे की क़ुर्बानी दें हज़रत इब्राहिम ने इस ख्वाब को अपने बेटे इस्माईल को बताया इस्माईल ने अपनी हां कर दी और वो अपनी क़ुर्बानी देने के लिए खुशी-खुशी राज़ी हो गये। इस दौरान शैतान ने इबा्रहिम अलैह सलाम को बरगलाया कि तुम्हे बंढ़ापे में तुम्हारी औलाद मिली और आगे कोई उम्मीद नहीं है फिर भी तुम क़ुर्बानी देने को तैयार हो,लेकिन हज़रत इबा्रहिम को शैतान डिगा नहीं पाया। जब हज़रत इब्राहिम ने क़ुर्बानी के लिए बेटे इस्माईल को लिटाया और जैसे ही छुरी को बेटे इस्माईल की गर्दन पर फेरने के लिए उठाई तभी अल्लाह की तरफ से सदा आई कि ऐ इबा्रहिम तू मेरे इम्तेहान में पास हो गया और इस तरह लेटे हुए इस्माईल की जगह एक भेेड़ में तब्दील हो गया। इसी के चलते दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अज़हा पर क़ुर्बानी का त्योहार मनाते हैं। अपने दौरे में हज़रत इब्राहिम और हज़रत इस्माईल ने मक्का में काबा बनवाया जहां हर साल लाखों की तादाद में हुज्जाज इकराम हज करने आते हैं। इसी दौरान सरहा को इस्मईल के 13 साल बाद बेटा हुआ उनका नाम इसहाक था हदीस और क़ुरआन की रोशनी में ज़िक्र है कि यहूदी,ईसाई और मुस्लिम धर्म में पैदा होने वाले लोग पैगम्बर के ही वशंज कहलाते हैं। हज़रत इस्माईल से इस्लाम धर्म की शुरूवात हुई। लिहाजा हज के अहकामों में से एक साफा और मारवाह की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द सात चक्कर लगाने की परम्परा है और हज़रत इब्रहिम को शैतान ने बरगलाया था इसलिए हज के दौरान शैतान को कंकड़ मारने की प्रथा यहीं सं शुरू हुई जो आज भी चली आ रही है। क़ुर्बानी देना एक परम्परा ही नहीं है वल्कि ये याद भी दिलाती है कि वगैर किसी शक और अहंकार के अल्लाह पर यक़ीन रखो।