अंधविश्‍वास में निभाई जा रही ये दर्दनाक परंपरा , मां की गोद में ही बच्‍चे को दाग देते हैं गर्म सलाखों से



मकर संक्रांति के दूसरे दिन सुबह आदिवासी बहुल इलाके में ओझा अलाव जलाते हैं, उसमें चार मुंह वाले सलाख को तपाते हैं। वहींं एक खाट बिछी होती है जिसमें बच्चे को लाकर लिटाया जाता है। उसके हाथ-पैर जकड़ दिए जाते हैं। जाड़े के मौसम में बच्चे के शरीर से कपड़े उतार दिए जाते हैं। कपड़े हटने के बाद बच्‍चे की नाभि के आसपास चार जगहों पर सरसों का तेल लगा कर उसमें गर्म सलाखों से दाग लगाए जाते हैं। इस दौरान पूरा गांव बच्‍चों की चीत्‍कार से गूंजता रहता है। बच्‍चा जोर-जोर से रोता है लेकिन परिवार के सदस्‍य उसे इतनी जोर से पकड़कर रखते हैं कि वह तड़प भी नहीं पाता है। दागने के बाद दाग वाले स्थान पर फिर से सरसों तेल लगा दिया जाता है। दुधमुंहे से लेकर पांच साल तक के बच्‍चों को इस असहनीय पीड़ा से गुजारा जाता है।


लोग करते हैं इस दिन का इंतजार 


अंधविश्‍वास के आधार पर वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को निभाने के लिए लोग इस दिन का इंतजार करते हैं। लोगों का इस परंपरा पर विश्‍वास कितना गहरा है इसे सुंदरनगर में 'चिड़ीदाग' के दौरान मिले ओझा नारू चाकी नाम के एक शख्‍स की बातों से समझा जा सकता है। ओझा नारू ने कहा कि यह विश्वास की ऐसी परंपरा है जो सदियों से चली आ रही हैं। हम मानते हैं कि इससे पेट की बीमारियां दूर होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतने लोग इस दिन का इंतजार क्यों करते।


नई पीढ़ी भी रम रही अंधविश्‍वास में

सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्षों से चले आ रहे इस अंधविश्‍वास में नई पीढ़ी भी रमती जा रही है। नई उम्र के लोग भी बच्‍चों को गर्म सलाखों से दागने की यह पीड़ादायक परंपरा सीख रहे हैं। बच्‍चों को उनके गांवों के देवी-देवताओं का नाम लेकर दागा जाता है। 

Sources:HindustanSamachar