माहे मोहर्रम : मेरे बचपन के मोहर्रम (ताज़ियादारी)और अब के मोहर्रम(ताजियादारी) में फ़र्क़ क्यूँ,?

 



 जब मैं 10 साल का था तब माह मोहर्रम का चाँद होते ही मोहल्ला कुरैशियान से रोज़ 10 दिन तक मगरिब के बाद डफली वाले अपनी डफली बजाते हुए ख्वाजा चौक, दर्ज़ी चौक,काजी मोहल्ले तक आते थे,फिर  चाँद की 5 तारीख को पिटारी व अलम उठते थे,मोहल्ला खेड़ा, झंडा, पश्चिम, ख्वाजा चौक पर भी अलम लगते थे और घूमते थे, चाँद की 7 को मेहंदी उठती थी वस्ती के नंन्हे छोटे बच्चो को बड़ा अच्छा लगता था, उनको क्या मालूम इसका क्या मतलब है  उनको तो सिर्फ घूमने से और रोशनी मलीदे से  मतलब था शाम को जल्द खाना खा लेना फिर रात को पूरी रात घूमने की तैयारी करना, रात को मातम में लोगो का जाफ़ गश खाकर गिरना फिर सुवह में महल के सामने का मंज़र कुछ अलग ही होता था। लगता था कि असल जंग की तैयारी हो रही है।। 9वी रात ताज़िये उठते थे फिर दिन में  मेला और ताजियों व मेहंदी के साथ मातम करने वाले नौजवान  ही होते थे कोई भी हाफ़िज़ आलिम कभी मातम करते नही दिखाई देते ।क्या इनको इसके सवाब का पता नही और गदके वाले और बेलन उठाने वाले सब अपने अपने तरह से खेलते थे। शाम को कर्बला पर जाना रोटी साथ जाती थी।वहाँ ताज़ियो का दफन किया जाना।जब अबसे कुछ अलग ही मोहर्रम थे।।इस बार के मोहर्रम कुछ अलग ही मालूम पड़े, समझ नही आता ।।जब के मोहर्रम सही थे या अब के ,,हम किसको सही कहे,अपने बुजुर्गों के तरीके को या अब की नस्ल के तरीके को।आलिम जब भी थे और अब भी है ।तो ये फ़र्क़ क्यों हुआ इस्लाम नया तो है नही ।।समझ नही आ रहा, किसको सही कहा जाए,,,,,मेरी इस्लाह करें।।। 


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