वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्यात्म

 

 

  प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"

 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण कल्पनाशीलता एवं अंतर्ज्ञान से निर्मित होता है। किसी भी वैज्ञानिक खोज का आधार अंतर्ज्ञान से उपजी कल्पनाशीलता होती है। और यह अंतर्ज्ञान आध्यात्मिकता से ही चेतन होता है। वैज्ञानिक खोज वास्तविकता धरातल पर होती है। एक ऐसी वास्तविकता जिसे हम स्वीकार करें या न करें। विज्ञान हमारे मन की अमूर्त शक्तियों पर आधारित है जिसमें हमारी उत्कृष्टता की सारी उम्मीदें निहित हैं। वास्तव में विज्ञान, कला एवं मानव संबंधों में नैतिक मूल्यों एवं परिवर्तनों का गहरा प्रभाव पड़ता है एवं यही मूल्य विज्ञान की रचनात्मक खोजों के वास्तविक आधार होते हैं। हमारा अंतर्ज्ञान तालमेल के नए मानक तय करता है एवं इन मानकों के आधार पर मानव मस्तिष्क वास्तविकता को समझता है एवं यह वास्तविकता की समझ विज्ञान की खोजों को प्रतिपादित करती है। हमारा अंतर्ज्ञान एक अतिरिक्त सहायक के रूप मस्तिष्क से तालमेल कर नए विचारों को सृजित करता है एवं ये विचार विज्ञान की खोजों के सिद्धांत बनते हैं। आध्यात्मिकता एवं बौद्धात्मिकता से भौतिकता की ओर बढ़ता ये विश्व हर स्तर पर विवाद और संघर्ष से घिरा हुआ है। ये विश्व शांति एवं सद्भाव की खोज में विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच विवाद में फँस कर रह जाता है। समकालीन परिदृश्य में वे प्रयास जो इन दोनों के लिए सेतु का काम करते हैं अराजकता की बाढ़ में बह जाते हैं। 

शब्दकोष से इसे परिभाषित करना बहुत कठिन है। इसे हम रहस्यों से मुलाक़ात कह सकते हैं। आध्यात्मिकता व्यक्ति की वह जीवन पद्धति जिससे वह अपने जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। किसी भी धर्म को उसकी आध्यात्मिक प्रणाली से ही परिभाषित किया जा सकता है। धर्म जटिल प्रणालियों का वह आचरण है जो संघटित या असंघटित लोगों को किसी देवी देवता की आस्था में निजी जीवन में आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों का आचरण करवाता है एवं दूसरे व्यक्तियों एवं पूजन पद्धतियों के सापेक्ष सम्बन्ध स्थापित करवाता है। अध्यात्म वह आन्तरिक मार्ग है जो व्यक्ति को उसके अस्तित्व की खोज में सक्षम बनाता है। 

प्राकृतिक दुनिया को जानने का तर्क संगत,अनुभवजन्य, ज्ञानवादी सात्विक प्रकार जो साधनों के आधार पर किसी विचार को सिद्धांत मान कर प्रतिपादित करता है उसे हम विज्ञान कहते हैं। विज्ञान हमेशा से सिद्धांतों के प्रतिपादन में लगा रहता है। इस प्रतिपादन में तथ्य एवं तार्किक सबूत किसी भी पदार्थ एवं प्रक्रिया को विश्लेषित करते हैं। विज्ञान हमेशा अवधारणा को अपने ज्ञान एवं तर्क से तौलता है और प्रयोगों के आधार पर अपना निष्कर्ष देता है। विज्ञान के सभी सिद्धांत कसौटी पर कसे जाते हैं एवं प्रत्येक मनुष्य की बुद्धि एवं समझ से गुज़र कर ही सर्वमान्य एवं सार्वभौमिक बनते हैं। 

विज्ञान खोज के लिए बाहरी या भौतिक जगत का प्रयोग करता है जबकि आध्यात्मिक खोज के लिए आत्मिक जगत का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान प्रतिपादित करता है कि "यह जगत क्या है?" जबकि अध्यात्म प्रतिपादित करता है कि "मैं कौन और क्या हूँ?" विज्ञान की समझ हमें दूसरों से परिचित कराती है जबकि आध्यात्म की बुद्धि हमें स्वयं से परिचित कराती है। यह जगत चेतन एवं अचेतन पदार्थों से बना हुआ है। पदार्थों का परीक्षण विज्ञान के अंतर्गत आता है एवं चेतन व अंतर्मन को समझ कर उसे जाग्रत रखना आध्यात्म के अंतर्गत आता है। वास्तव में विज्ञान शब्द की पूर्णता, उद्देश्य एवं सार्थकता आध्यात्म में ही निहित है। विज्ञान सिद्धांतों को भौतिक रूप से प्रतिपादित करता है जबकि आध्यात्मिकता में सिद्धांत भौतिक रूप से प्रतिपादित नहीं किया जा सकते हैं। विज्ञान हमें पदार्थ एवं प्रकृति को समझाता है जबकि आध्यात्मिकता सिर्फ़ मन एवं संकल्प पर आधारित है। सभ्यता वैज्ञानिक या भौतिक खोजों एवं अनुभवों का एक सतत प्रयास है। इन खोजों एवं प्रयासों से समाज विकास की ओर उन्मुख होता है एवं मानव ज्ञान इससे परिष्कृत होता है। चेतना पदार्थों से ऊपर है एवं चेतन ही अपनी इच्छा से पदार्थों का उपभोग कर सकते है। अतः हम कह सकते हैं की आध्यात्मिकता विज्ञान का अंतिम स्वरूप है।
 
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