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बगदाद : अल-रशद के शिया बहुल गांव में IS का हमला, 11 लोगों की मौत, 6 घायल

  बगदाद /   इस्लामिक स्टेट के कुछ बंदूकधारियों ने बगदाद के पूर्वोत्तर के एक गांव में हमला कर दिया, जिसमें कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई और छह अन्य घायल हुए हैं। इराक के सुरक्षा अधिकारियों ने यह जानकारी दी।  अधिकारियों ने बताया कि हमला दियाला प्रांत के बाकूबा के पूर्वोत्तर में अल-रशद के शिया बहुल गांव में हुआ। हमला क्यों किया गया यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन दो अधिकारियों ने बताया कि इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने पहले दो ग्रामीणों का अपहरण किया था और जब उन्हें फिरौती के पैसे नहीं दिए गए तो उन्होंने गांव पर हमला कर दिया। नाम उजागर ना करने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि हमले में मशीन गन का इस्तेमाल किया गया।  हमले का शिकार बने सभी लोग आम नागरिक थे। वर्ष 2017 में देश से इस्लामिक स्टेट को खदेड़ दिए जाने के बाद से इराक में आम नागरिकों को निशाना बनाकर किए जाने वाले हमले बेहद कम हो गए हैं, हालांकि कई इलाकों में अब भी ऐसी घटनाएं देखी जा रही हैं। सुन्नी मुस्लिम चरमपंथी संगठन के आतंकवादी अब भी सक्रिय हैं, जो अक्सर सुरक्षा बलों, बिजली स्टेशनों और अन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बनाते ह

सियासी पृष्ठभूमि पर लिखी गई पटकथा है ‘‘लव जिहाद’’

 


   *सलीम रज़ा*



सियासत के भी अपने-अपने फन्डे हैं,कोई सियासी पार्टी किसी चीज का विरोध करती है तो दूसरी सियासी पार्टी उसकी पैरवी फिर शुरू कर देती है, रहा धु्रवीकरण की सियासत का खेल तो इस खेल में जो पारंगत होगा वही सिकंदर कहलायेगा। फिलहाल हिन्दुस्तान में मौजूदा वक्त में 4.1का खेल खूब जोर-शोर से चल रहा है। सियासत की प्रयोगशाला में मुद्दों के भी क्लोन तैयार किये जाते हैं जो सियासी रोटी सेंकने का बढ़िया ईंधन होते हैं। बहरहाल हमारा देश इन दिनों महामारी के दौर से गुजर रहा है और अभी न जाने कोरोना के कितने वैरिएंट का सामना करना पड़ सकता है, देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई है,बेरोजगारी का फीसद बढता जा रहा है, चिकित्सा स्वास्थ व्यवस्था हिचकोले खा रही है, शिक्षा सिसक रही है लेकिन चुनाव का वक्त करीब आते ही सारे मुद्दे गौण हो जाते हैं और प्रदेश के हिसाब से धु्रवीकरण के ताजातरीन मुद्दे परोसकर सियासी सीटों का अंकगणित बनाने की तैयारी शुरू हो जाती र्है। फिलहाल 2022 में सात राज्यों में चुनाव होने हैं और प्रदेशवार मुद्दे सियासी रणभूमि में अपना किरदार निभाने के लिए छोड़ दिये गये हैं। इन मुद्दों में ‘लव जिहाद’ और ‘जनसंख्या नीति’ हैं जो भाजपा शासित प्रदेश में मौजूदा पार्टी का सियासी भविष्य तय करेंगे। अक्सर कहा ये गया है कि जिस चीज का जितना विरोध होता है उसे निःशुल्क ही ख्याति मिलती है, अब सवाल ये उठता है कि डर 80 से होता है न कि 20 से लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है क्योंकि यहां सुरक्षित 20 और खतरे में 80 हैं! जी हां ये सियासत की अंकगणित है जो सारे माप दण्डों को दरकिनार करके सूत्र तैयार करती है। बहरहाल,बात लव जिहाद से शुरू हुई तो अभी इसे यहीं रखा जाये सबसे पहले तो ये तलाशें  कि ए प्लस बी का फार्मूला कहां से और कैसे बना, जिहाद कैसे आया दरअसल जिहाद  के बारे में ज्यादा तो नहीं थेड़ा सा ही जानना जरूरी है जिहाद का भी वर्गीकरण है ‘जेहाद अल अकबर’ और ‘जेहाद अल असगर’जेहाद अल अकबर  अहिंसात्मक संघर्ष का द्योतक है तो जेहाद अल असगर इस्लाम के लिए संरक्षण करना होता है। लेकिन वक्त के साथ-साथ इस जेहाद की शक्लो सूरत ने अपना खौफनाक रूप ले लिया जो आतंकवाद और लव जिहाद के रूप में प्रचारित और प्रसारित होने लगा। ये बात सभी जानते हें जब देश की आंतरिक और वाहय सुरक्षा को खतरा होने लगता है तो शक का दायरा बढ़ जाता है और ये लाजमी भी है क्योंकि इसका खामियाजा देश की जनता को भुगतना पड़ता ही है। देश के अन्दर चाहें सिक्ख हों ईसाई हों या फिर मुस्लिम सभी अपने आपको साबित करने में लगे हुये हैं कि वो राष्ट्रभक्त हैं लेकिन काफी संघर्षों के बाद भी ये बात अधूरी है ? अब जबकि विधान सभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होने वाली है ऐसे मैं आतंकवाद लव जिहाद जैसे माडयूल्स चमकने लगे,पहले धर्मातरण कानून फिर उसकी कोख से निकला लव जिहाद इस चुनाव का बेहतरीन हथियार होगा। अगर हम गौर करें तो ये भी सही बात है कि लालच में या जबरन कराया गया धर्म परिवर्तन कानूनन अपराध है ऐसे ही जबरन अंतरधर्मिक विवाह यानि जिसे भाजपा ने लव जिहाद का नाम दिया है भी कानूनन जुर्म है। मैंने कहा था कि भाजपा का ये लव जिहाद सियासी पृष्ठभूमि में लिखी गई पटकथा है तो ठीक भी है वो इस तरह से कि जब संविधान में इस बात का उल्लेख है कि वो किसी भी धर्म के दो वयस्क स्त्री या पुरूष को आपसी सहमति से शादी करने की इजाजत देता है इसमें धर्म या जाति के बिनाह पर बंदिश नहीं लगाई जा सकती वहीं संविधान में पहले से ही धारा 493 है जिसका मतलब दो धर्मों के बीच शादी में लालच, दबाव या और कोई गलत रास्ता अख्तियार किया जाता है तो ये संगीन अपराध है और इसके लिए सख्त से सख्त सज़ा का प्रावधान है। ऐसे ही जबरन धर्म परिवर्तन पर भी संविधान में आई.पी.सी की धारा में सख्त सज़ा है ,फिर धर्म परिवर्तन और लव जिहाद पर नया कानून बनाने की पैरवी क्यों? अगर ये कहा जाये कि ये कानून और इसके पैरोकार सिर्फ वो हैं जो बहुसंख्यक एजेंडे को आगे बढ़ाकर उनके अन्दर एक नया खौफ पैदा करके उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा का ड्रामा करके वोटों का धु्रवीकरण करने की लालसा पाले हूये हैंतो शायद गलत नहीं होगा। अगर ये कहा जाये कि भाजपा के लिए ये चुनावी हथियार है तो शायद गलत भी नहीं होगा। क्योंकि  अब फिरं लव जिहाद का ज्निन बोतल से बाहर आ चुका है और बाकायादा इस पर बहस छिड़ी हुई है । आपको मालूम है कि उत्तर प्रदेश सरकार सहित भाजपा शासित प्रदेश इसके लिए कानून बना चुके है, लेकिन ये पुरानी रील और नई फिल्म की ये स्क्रिप्ट महज चुनावी भवसागर पार करने के लिए किसी सेतु से कम नहीं है। दरअसल संगठित होते समुदायों के बीच खाई बनाने की रूपरेखा ही लव जिहाद है। सियासत का गढ़ माना जाने वाला उत्तर प्रदेश के अन्दर भाजपा की प्रयोगवादी नीति के तहत शुरूवाती दौर में चलाया गया एक शब्द बाण था जो सफल हुआ आपको स्मरण होगा कि जब भाजपा केन्द्र की सत्ता में आने के लिए बेताब थी तो कांगेस के संगठित वोट बैंक को छिन्न-भिन्न करने के लिए पूरी ताकत के साथ सियासी मुद्दे के तौर पर पूरे भारत में लव जिहाद को रेखांकित करके मुद्दा बनाया गया था। आपको याद होगा 2013 में भाजपा ने इसे सियासी मुद्दा बनाया जिसका नतीजा ये निकला कि इस मुद्दे की आग में मुजफ्फरनगर जलने लगा वहां भड़के दंगों में तकरीबन पांच दर्जन से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था नतीजा ये हुआ कि समूचा उत्तर प्रदेश धर्मिक धु्रवीकरण की भेट चढ़ गया और इस लव जिहाद की लहर से सामाजिक सौहार्द खत्म होता चला गया। इस उथल-पुथल से भाजपा को दो फायदे हुये कि एक तो कृषि समुदाय के लिए जाना जाने वाले जाट और मुस्लिम नदी के दो किनारे की तरह हो गये एक दूसरे को किारत की नजर से देखने लगे यही सामाजिक बिखराव था जो आज भी भाजपा को सियासी फायदा पहुचा रहा है। इसको और ज्यादा धार देने के लिए भाजपा और संघ ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म का सहारा लिया और जिसमें लव जिहाद की स्क्रिप्ट और भी नये कलेवर और मसालेदार बनाकर बहुसंख्यकों के बीच परोसी गई। इसमें भाजपा के आई.टी.सेल ने भी अपनी भूमिका बड़ी मेहनत और ईमानदारी के साथ निभाई और नित नये-नये एडिट वीडियो जो मुस्लिमों को खलनायक के रूप में प्रदर्शित कर रहे थे खूब परोसे गये, जिससे वैमनस्य की दीवार और पुख्ता हो गई। कवाल कांड इसका जीता जागता उदाहरण था। लिहाजा भाजपा का मिशन तकरीबन क्लाईमेक्स पर था कि 2014 का संसदीय चुनाव आ गया और भाजपा का मिशन लव जिहाद अपना रंग लाया परिणाम ये हुआ कि धार्मिक आधार पर वोटों को बांटकर भाजपा ने उत्तर प्रदेश की सभी सीटों को अपने कब्जे में कर लिया था अब फिर विधान सभा चुनाव का समय नजदीक आ चुका है देश कोरोना जैसी महामारी का दंश झेल रहा है अर्थव्यवस्था के पहिये पटरी से उतर चुके हैं मंहगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रही भाजपा आज भी धर्मांतरण, लव जिहाद जैसे मुद्दे को फोकस कर रही है और भाजपा शासित प्रदेश जिस तरह से केन्द्र के इशारे पर एकजुट होकर आवाज उठा रहे हें उससे एक बात तो साफ हो जाती है कि ये भाजपा और संघ का पूर्व नियोजित कार्यक्रम है वहीं दूसरे भाजपा अपनी नाकामी को छिपाने के लिए जनता का ध्यान भटकाना चाहती है।फिलहाल इस बार का विधान सभा चुनाव मुस्लिमों को फोकस करते हुऐ तीन मुद्दों पर ही लड़ा जायेगा वो हैं धर्मांतरण,लव जिहाद और जनसंख्या नीति इसमें धार्मिक और सामाजिक बिखराव का खेल खेला जायेगा और आपके संगठनात्मक धैर्य की परीक्षा ली जायेगी जिसके लिए भाजपा और संघ पूरी तरह से तैयार है।

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