मां के आंचल पिता के साये से महरूम बच्चेे किस से कहें दर्द: सारिका प्रधान

           सारिका प्रधान

 

 

अनायास ही दिल की पीड़ा को बयां करता ये गीत ‘‘ तू कितनी अच्छी है तू कितनी भोली है प्यारी-प्यारी है ओ मां.......‘‘ आज भी जब ये गीत सुनने को मिलता है तो लोगों के आंखों में आसूं आ जाते हैं। लेकिन फिल्मांकन और सत्य के बीच दर्द का वो दरिया है जिसमें मासूमों की सिसकियां सुनाई देती हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड वैसे भी प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलता ही रहता है लिहाजा अपनों से अपनों के बिछड़ने, पति को खो  देने, मासूमों के अनाथ होने के दर्दाें की टीस हम महसूस करते रहते हैं, लेकिन कारोना की दूसरी लहर नें जिस तरह पूरे देश में अपना विकराल रूप धारण किया उसमें न जाने कितने मासूम अपने माता-पिता के साये से महरूम हो गये जिनके लिए कभी मां की गोद बिस्तर तो पिता की बाहें पालना हुआ करती  थीं । आज वो बेसहारा होकर अपने बिस्तर और पालने को कातर नज़रों से निहार रहे हैं। उनकी टकटकी बता रही है कि उनका दर्द हर दर्द पर भारी है।

 


 हम महसूस कर रहे हैं कि माता-पिता का साया खो देने के बाद ये बच्चे अनाथ ही नहीं वल्कि ये बच्चे भावानात्मक चुनौतियों का सामना तो कर ही रहे हैं साथ ही साथ ऐसे बच्चे भी हैं जो वित्तिय परेशानी से दो चार हो रहे हैं, ऐसे में उनके भविष्य पर आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के आंकड़ों पर ध्यान दें तो कारोना जैसी घातक महामारी ने तकरीबन 3600 से ज्यादा बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छीन लिया है इतना ही नहीं 26000 से ज्यादा उन बच्चों की संख्या है जिनके माता-पिता दोनों में से एक नहीं है। हालांकि सवयं सेवी संस्थायें इन अनाथ बच्चों के लिए आगे आ रही हैं लेकिन क्या आप अन्दाजा लगा सकते हैं उन बच्चों की मनोस्थििति के बारे में जो रात में सो गये और सुबह अपने पिता या माता को बिछड़ता हुआ पाते हैं, कैसे उन मासूमों को जबाव मिलता होगा, कैसे उन मासूमों को दिलासा दिया जाता होगा सच में उन बच्चों को दिलासा देकर उनके होठों पर मुस्कराहट लाने वाला कितने बड़े दिल का होगा कैसे हिम्मत बटोरकर अपने अन्दर महसूस होते दर्द को छिपाकर उस मासूम को सुनहरे ख्वाबों के साये में सुलाकर अपनी आंखों से आंसू तो जरूर निकाल लेता होगा। बहरहाल स्वयं सेवी संगठनों के भी अपने-अपने दायरे और सीमाऐं होती हैं लिहाजा ऐसे बच्चों की देखभाल करना सरकार का दायित्व भी बनता है ऐसे में सरकार ने भी वातसल्य योजना चलाई है जो अपने माता-पिता को खो चुके उनको हर माह वित्तिय मदद दी जायेगी लेकिन इस त्रासदी ने हमें बता दिया कि प्रकृति के कहर के आगे हम नतमस्तक हैं फिर भी खुशी और गम के बीच फसे हम उन बच्चों का दर्द तो बांट सकते हैं।  

 साभार: लेखिका पूर्व  दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री व समाज सेविका है