सूफी ए बा सफा उस्ताज़ूल उलमा हज़रत अल्लामा मौलाना शमसुददीन मुजद्दिदी क़ादरी उर्फ़ मियाँ जी का इंतिक़ाल



सूफी ए बा सफा उस्ताज़ूल उलमा हज़रत अल्लामा मौलाना शमसुददीन मुजद्दिदी क़ादरी उर्फ़ मियाँ जी का देर रात इंतिक़ाल हो गया हज़रत अपनी इलमी व दीनी खिदमात के हवाले से इन्तहाई बलंद मक़ाम पर फाइज़ थे. कस्बा सैदपुर और उसके क़ुर्ब व जवार के अक्सर उलमा व हुफ्फाज़ व क़ुर्रा मियाँ जी से ही बराहे रास्त या बिल्वास्ता शागिर्दी का शरफ़ रखते हैं आप के शागिर्दओं में दो आलिम ए दीन आलम ई शुहरत के हामिल हैं. (1)हज़रत अल्लामा मौलाना मुफ़्ती सय्यद वाक़िफ़ अली साहब क़िब्ला सैदपुरी (2)हज़रत अल्लामा मौलाना शाने आलम साहब सैदपुरी. के साथ कई बेहतर शागिर्द दीनी खिदमात कर रहे है जुमे की रात करीब तीन बजे उनका इंतकाल हो गया उनके इंतकाल की खबर से कस्बा में शोक की लहर दौड़ पड़ी अंजुमन रज़ाए मुस्तफ़ा के सदर जाहिद हुसैन कुरैशी, ईदगाह पेशे इमाम मुफ्ती सैयद वाकिफ अली अशरफी और ईदगाह के पूर्व पेशे इमाम मौलाना शाने आलम खाँ  मुम्ताज़ हैदर सहित दर्जनभर उलमा  ने गहरा दु:ख व्यक्त किया जुमे की नमाज के बाद उनकी नमाजे जनाजा मुफ्ती सैयद वाकिफ अली अशरफी ने पढ़ाई नमाज के पश्चात उन्हें सैदपुर करेंगी मार्ग पर स्थित  कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। लॉकडाउन के  मद्देनजर लोगों को घरों को वापस भेज दिया गया।

हज़रत मूलतः बिहार के जिला किशनगंज के गांव कदमघाची के रहने वाले मौलाना शमसुद्दीन क़ादरी 1980 में कस्बा के मदरसा दारुल उलूम गौसिया में प्रिंसिपल पद पर नियुक्त हुए थे उन्हें उर्दू ,अरबी, के साथ फारसी का काफ़ी ज्ञान था यहाँ रहकर 40 साल से अधिक कस्बा में रहकर दीनी खिदमत के साथ उन्होंने कस्बा की कई मस्जिदों में इमामत भी की छ: साल तक वह ईदगाह के इमाम भी रहे वह एक सादगी पसंद करने वाले मौलाना थे वह अधिकांश समय अपने हुजरे में इबादत में मसरूफ रहते थे, कभी-कभी कई कई दिन तक खाना भी नहीं खाते थे औरतों से विशेष रूप से पर्दा करते थे यहां तक शादी के कुछ साल बाद ही अपनी पत्नी तक को त्याग दिया था। वह करीब 40 साल पहले बिहार से आकर स्थापित हुए थे। कई सालों से वह कस्बा के मोहल्ला गौसनगर में रह रहे थे कुछ दिन से उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी शुक्रवार रात करीब तीन बजे उनका इंतकाल हो गया


Sources : Shahid noori fb walls