भारत जलवायु जोखिम सूचकांक के शीर्ष दस देशों में शामिल

  

Climate कहानी

हमारे आपके समाज में आज भी ऐसे तमाम लोग हैं जो जलवायु परिवर्तन को अपनी समस्या नहीं मानते और किसी दूर देश की परेशानी समझते हैं

लेकिन ऐसे लोगों के लिए आज जारी क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स यक़ीनन हैरान करने वाला होगा। यह इंडेक्स बताता है कि जलवायु परिवर्तन को ले कर कौन सा देश कितने ख़तरे में है। तो बात जब जलवायु परिवर्तन की वजह से उपजे ख़तरों की हो तो आपको जान कर हैरानी होगी कि इन ख़तरों के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष दस देशों में शामिल है

भारत जलवायु जोखिम सूचकांक की सातवीं पायदान पर है और मोजाम्बिक यहाँ शीर्ष पर है भारत के ऊपर हैं ज़िम्बाब्वे, जापान, और मलावी जैसे देश शीर्ष के पांच देशों में तीन अफ्रीका से हैं 
जहाँ मोज़ाम्बीकज़िम्बाब्वे और बहामास को भारी तूफानों और उनके सीधे प्रभाव ने 2019 में सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाई, वहीँ पुएर्तो रिकोम्यांमार और हैती में 2000 - 2019 की अवधि में सबसे अधिक मौसम संबंधी नुकसान हुआ।  

विकासशील देशों में कमज़ोर लोग/समूह  तूफानबाढ़ और गर्मी की लहरों जैसी चरम मौसम की घटनाओं से सबसे अधिक पीड़ित होते हैंजबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दुनिया भर में दिखाई देते हैं। दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर में सबसे घातक और महंगे उष्णकटिबंधीय चक्रवातइडाईको संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा "अफ्रीका के इतिहास में सबसे खराब मौसम से संबंधित तबाही में से एक" करार दिया गया। इसने विनाशकारी क्षति और मानवीय संकट पैदा कियाजिससे मोज़ाम्बीक और ज़िम्बाब्वे, 2019 मेंदो सबसे अधिक प्रभावित देश रहे। तूफान डोरियन की तबाही के उपरांत बहामास तीसरे स्थान पर है। पिछले 20 वर्षों (2000 - 2019) मेंपुएर्टो रीकोम्यांमार और हैती ऐसे मौसम की घटनाओं के प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित देश थे।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 (वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक 2021) के कुछ मुख्य नतीजे आज अंतर्राष्ट्रीय जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन शुरू होने से कुछ घंटे पहलेपर्यावरण थिंक टैंक जर्मनवॉच द्वारा प्रकाशित किए गए हैं।

भारत का इस सूचकांक में जगह बनाने पर भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर और एडजंक्ट  एसोसिएट प्रोफेसर, IPCC (आईपीसीसी) की महासागरों और क्रायोस्फीयर पर विशेष रिपोर्ट के कोऑर्डिनेटिंग लीड (प्रमुख) लेखकऔर IPCC की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट के वर्किंग ग्रुप 2 में लीड लेखक, डॉ.अंजल प्रकाशकहते  हैं,  यह जानना आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत 2021 के वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक में शीर्ष 10 सबसे प्रभावित देशों में शामिल है। भारत पारिस्थितिकीय विविधता से धन्य है - ग्लेशियरऊंचे पहाड़लंबी तटरेखा और साथ ही बड़े पैमाने पर अर्ध-शुष्क क्षेत्र जो जलवायु परिवर्तन के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से चक्रवातों की आवृत्ति में वृद्धिग्लेशियरों के पिघलने की गति में तेज़ीऔर हीटवेव हो रहें हैं।” वो आगे कहते हैं, अधिकांश भारतीय आबादी कृषि पर निर्भर हैजो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस वर्षभारत ने अपने कई शहरों को मानसून प्रणाली की परिवर्तनशीलता के कारण डूबते देखा। IPCC रिपोर्ट सहित कई वैश्विक रिपोर्टें साल दर साल इस ओर इशारा करती रहीं हैं।

अपनी बात को विस्तार देते हुए डॉ प्रकाश एक सवाल उठाते हुए कहते हैं, अपने लोगों की सुरक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के ख़िलाफ सरकार की प्रतिक्रिया की कमी क्या है? 2008 में एक राष्ट्रीय अडॉप्टेशन योजना तैयार की गई थीजिसके बाद राज्य की योजनाएं बनाई गई थी। पर अधिकांश योजनाओं में संसाधनों की कमी हैइसलिए वे जिला विकास और आपदा जोखिम में कमी लाने की योजनाओं में एकीकृत हो जाती हैं। वो समय आ चूका है कि सरकार इस जानकारी का अधिक विभाजन करने के लिए भारत के राज्य / ज़िला विशिष्ट जलवायु-जोखिम मानचित्रों को आयोगित करती है ताकि यह समझ सकें कि किन क्षेत्रों पर औरों से ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।"

इस सूचकांक पर जर्मनवाच के डेविड एकस्टीन कहते हैं, “ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स से पता चलता है कि ग़रीब और कमज़ोर देश चरम मौसम की घटनाओं के परिणामों से निपटने में विशेष रूप से बड़ी चुनौतियों का सामना करते हैं। उन्हें वित्तीय और तकनीकी सहायता की तत्काल आवश्यकता है। इसलिएहाल के अध्ययनों से ये पता चलना किपहलेऔद्योगिक राष्ट्रों द्वारा प्रतिज्ञा किया गया 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य नहीं पहुँचा जाएगाऔर दूसरा यह कि जलवायु अनुकूलन के लिए इसका केवल एक छोटा सा अनुपात प्रदान किया गया है। आज से शुरू होने वाले जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन को इन समस्याओं का समाधान करना चाहिए।"

2000 और 2019 के बीच सबसे अधिक प्रभावित दस देशों में से प्रति व्यक्ति कम या निम्न मध्यम आय वाले विकासशील देश हैं। जर्मनवाच की वेरा कुएन्ज़ेल बताती हैं, “गरीब देशों को सबसे ज़्यादा हानि पहुँचती है क्योंकि वे खतरों के हानिकारक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और उनकी क्षमता कम होती है। हैतीफिलीपींस और पाकिस्तान जैसे देश बार-बार चरम मौसम की घटनाओं की चपेट में हैं और अगली घटना के होने से पहले उन्हें पूरी तरह से ठीक होने का समय नहीं मिलता है। इसलिएउनके लचीलेपन को मजबूत करने के लिएन केवल अडाप्टेशन को संबोधित करना चाहिएबल्कि नुकसान और नुकसान से निपटने के लिए आवश्यक सहायता भी प्रदान करना चाहिए। 

2000 से लगभग 480.000 लोग 11.000 से अधिक चरम मौसम की घटनाओं के परिणामस्वरूप मारे गए

पिछले 20 वर्षों मेंवैश्विक रूप से लगभग 480.000 घातक परिणाम सीधे तौर से 11.000 से अधिक हुई चरम मौसम की घटनाओं से जुड़े थे। आर्थिक क्षति लगभग यूएस-डॉलर 2.56 ट्रिलियन (क्रय-शक्ति समतापीपीपी (पर्चासिंग पावर पैरिटी)में गणना की गई) - एक वर्ष पहले की तुलना में फिर से वृद्धि (नीचे नोट देखें)।

तूफान और उनके प्रत्यक्ष निहितार्थ - प्रेसिपीटशन (वर्षाबर्फ़ आदि की पड़ी मात्रा)बाढ़ और भूस्खलन - 2019 में क्षति के प्रमुख कारण थे। 2019 में दस सबसे अधिक प्रभावित देशों में से छह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से प्रभावित थे। हाल के विज्ञान से अनुमानित है कि न केवल गंभीरताबल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि के हर दसवें डिग्री के साथ गंभीर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या में वृद्धि होगी।

जर्मनवाच की लॉरा शेफर कहती हैं, "वैश्विक कोविड-19 महामारी ने इस तथ्य को दोहराया है कि कमज़ोर देश विभिन्न प्रकार के जोखिम - जलवायुभूभौतिकीयआर्थिक और स्वास्थ्य से संबंधित -  के संपर्क में हैं और यह भेद्यता प्रणालीगत है और परस्पर संबंधित है। इसलिए इन अंतर्संबंधों पर ध्यान डालना महत्वपूर्ण है। देशों की जलवायु लचीलापन को मज़बूत करना इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने का अवसर प्रदान करता है। 

बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी से जलवायु वैज्ञानिक और जल और बाढ़ प्रबंधन संस्थान के निदेशक, डॉ. एम. शाहजहां मोंडल ने कहा, बांग्लादेशअपने भूभौतिकीय स्थान की वजह सेहमेशा चरम मौसम की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील रहा है। हमारा देश हिमालयी क्षेत्र और तीन विशाल नदियों (पद्माजिसे भारत में गंगा कहा जाता हैमेघना और जमुना) के नीचें बहाव की ओर में हैजो मानसून के मौसम में उत्तर की ओर से सभी बाढ़ के पानी को नीचे ले आतें हैजिससे विनाशकारी बाढ़ आती है। सबसे हाल ही में 2020 मेंहमने ऐसी विनाशकारी बाढ़ का अनुभव किया जिसमें देश का एक चौथाई से अधिक हिस्सा पानी के भीतर हो था।

दूसरी ओरबंगाल की खाड़ीदुनिया का सबसे बड़ा जल क्षेत्र है जिसे खाड़ी कहा जाता हैऔर उष्णकटिबंधीय चक्रवात जो विशेष रूप से इस फ़नल-आकार की खाड़ी में बनते हैंघातक होते हैं। पिछले साल हमने चक्रवात एम्फैन का अनुभव किया थाजो 270 किमी प्रति घंटे की हवा की गति के साथ सबसे शक्तिशाली में से एक थाऔर सबसे  महंगा [में से एक] थाइसमें कुल नुकसान का अनुमान यूएस $ 13 बिलियन से अधिक था। यह वैज्ञानिक प्रमाणों से स्पष्ट है कि ग्लोबल वार्मिंग ऐसे चरम चक्रवातों के साथ-साथ अनियमित और लंबे समय से होने वाली बारिश का एक कारण है। 

 आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि जर्मनवॉच सालाना ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स की गणना के लिए म्यूनिख रे पुनर्बीमा कंपनी की नैटकैटसर्विस डाटाबेस और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष (IMF) के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों से अपना डेटा प्राप्त करता है। भले ही बढ़ते नुकसान और घातकताओं का मूल्यांकन इन घटनाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सरल निष्कर्ष की अनुमति नहीं देता हैयह भारी आपदाओं की वृद्धि को दर्शाता है और राज्यों और क्षेत्रों की प्रभावितता का एक अच्छा अनुमान देता है। 2006 से 2019 तक जर्मनवॉच ने वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (सीओपी/कौप) में सूचकांक प्रस्तुत किया हैसीओपी/कौप 26 के स्थगन के कारण इस बार सूचकांक को जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन से ठीक पहले प्रकाशित किया गया है।


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