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लखीमपुर खीरी हिंसा: जांच कर रही एस.आई.टी ने चश्मदीद गवाहों से साक्ष्य देने के लिए निकाला विज्ञापन

    लखनऊ  /   लखीमपुर हिंसा कांड में उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी गवाहों को सुरक्षा देने के निर्देश के बाद विशेष अनुसंधान दल (एसआइटी) ने जांच की गति और तेज कर दी है। एसआइटी ने चश्मदीद गवाहों से साक्ष्य देने का अनुरोध करते हुए विज्ञापन निकाला है। विज्ञापन में एसआइटी अपने सदस्यों के संपर्क नंबर जारी किया है। प्रत्यक्षदर्शियों से आगे आकर अपने बयान दर्ज कराने और डिजिटल साक्ष्य प्रदान करने के लिए उनसे संपर्क करने का आग्रह करती किया है। एसआइटी का कहना है कि ऐसे लोगों की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी और उन्हें पुलिस सुरक्षा दी जाएगी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि लखीमपुर खीरी हिंसा मामले के सभी गवाहों को गवाह सुरक्षा योजना, 2018 के मुताबिक पुलिस सुरक्षा दी जाए। साथ ही कोर्ट ने अन्य महत्वपूर्ण गवाहों के बयान भी सीआरसीपी की धारा-164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जल्द दर्ज कराने का निर्देश देते हुए कहा कि अगर बयान दर्ज करने के लिए मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं हैं तो जिला जज नजदीक के मजिस्ट्रेट से बयान दर्ज कराएंगे। इसके अलावा कोर्ट ने हिंसा म

रात का मसीहा



 जीशान सिद्दिकी



यूं तो मसीहा शब्द ही अपने आप में वो मर्तबा रखता है जिसके आगे सारे क्रियाकलाप फीके हैं। मसीहा का शब्दिक अर्थ ही मानव को जीवित रखने वाला है लेकिन ये खब्द भी सियासत और स्वार्थ की भेट चढ़ गया है। हमारा देश उत्सवों का देश है जहां हर माह कोई न कोई उत्सव रहता ही है। लेकिन भारत जैसे बड़े लोकतंत्र मे एक उत्सव ऐसा भी हे जो सियासत की चासनी में लिपटा बेहद मीठा और जायकेदार होता है जिसे चुनाव कहा जाता है। आपने अक्सर देखा होगा कि इस चुनावी मौसम में हर किसी को अगर किसी से प्यार उमड़ता है तो वो है गरीब दबा कुचला निरीह व्यक्ति जिसके जिस्म पर मांस की पतली लेयर जरूर देखी जा सकती है जो अपने नेता के आगमन पर अपने पिचके गालों को बेवजह तकलीफ देते हुये हसने का असफल प्रयास करता है। दरअसल उसे लगता है कि शायद अब उसके भाग्य के दरवाजे खुल जाये देवता तुल्य नेता जी उसके सामने खडे हुये मानों कह रहे हों मांग क्या मांगता है और वो अपनी खीस निपोरते हुये दोनों हाथों को जोड़कर कहता है बस आपकी कृपा हमारे ऊपर बनी रहे लो जी नेता जी के पास पहले ही से आश्वासन की पोटली है बस उसमें से आश्वासन निकालकर उसे दिया और हो गये कृतज्ञ। ये एक भूमिका है जिसके माध्यम से मैं ये बताना चाह रहा था कि मसीहा के भी कई रूप कई मुखौटे हैं जिसमें विश्वास और प्यार कम स्वार्थ ज्यादा होता है जिसके पीछे सिर्फ नायक बनने की कहानी झलकती है,लेकिन मैं वो सच कहने जा रहा हूं जिसने सही मायनों में मसीहा शब्द की सही परिभाषा देते हुये मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। दरअसल कल रात मैं अपने घर की गली के पास खड़ा हुआ था कि सामने से एक मोटरबाईक पर दो नौजवान आ रहे थे और उनके पीछे कम्बल लदे हूये थे कि अचानक मेरे पास आकर बाईक रोकीऔर कहा कि इस सर्द मौसम मे गरीबों,यतीमों को कम्बल ंबांट रहा हूं आप भी नाम बता दो जिससे कम्बल उन तक पहुच सकें। मैं उन नौजवानों को अपलक निहारता रहा और सोचने पर मजबूर हो गया कि दिखावटी और अपने नाम के लिए स्वार्थ का चोला पहनकर गरीबों का उपहास उड़ाने बालों से हटकर ये सही मायनों में मसीहा है, जो रात के अन्धेरों में सर्दी से कांप रहे एक ही गर्म कपड़े में कई लोगों को चिपके हुये लिपटे हुये लोगों को गर्माहट देने की हसरत लिए घूम रहे है। मैंने सोचा कि अगर कोई सियासी व्यक्ति होगा भी तो वो खुद सामनेेेेे न आकर इस नेक काम को करा रहा है जो अपने लिए सियासत का घर नहीं वल्कि लोगों के दिलों में अपना घर बना रहा हैं, जो सही मायनों में मसीहा कहलाने का हकदार है।   



इसे देख लो फिर लगा दूंगा

Sources:Zeeshsn Siddiqi




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