व्यंग्य - सियासत की पिच पर वादों के बाउन्सर

 

 


सलीम रज़ा


उत्तराखण्ड 21 साल 11 मुख्यमंत्री, वाह कितनी तेजी से सियासी घटनाक्रम बदलता है, इस प्रदेश में शायद ही कहीं बदलता होगा। जिसमें मुख्यमंत्री तो बदल जाते हैं, लेकिन मुददे नहीं। ऐसा नहीं लगता हर बार नई सीडी पुराना राग सुनते-सुनते फ्रस्टेशन होने लगती है। लेकिन शायद यहां की आवाम इस राग को सुनने की आदी हो चुकी है। हर बार चुनाव में सियासी पार्टियों के लोक लुभावने मैनीफैस्टो की चकाचाोैंंध के आगे नतमस्तक हो जाती है।


क्या आपको नहीं लगता कि उत्तराखण्ड में जो सियासी घटनाक्रम चलता है या जिस तरह से अपनी मांगों के समर्थन में लोग आये दिन सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतर रहे  फिर भी जनता को देखकर नहीं लगता कि यहां की आवाम के अन्दर समर्पण के संकेत मिलते हैं। ये भी देखने को मिला है कि आये दिन सोशल मीडिया पर एक से एक बुद्धिजीवी लोग टक-टक करते रहते हैं जो आये दिन सरकार के काम काज के खिलाफ तीखी टीका-टिप्पणी करते नजर आते हैं और इनकी पोस्ट पर कमेन्टस करने वालों की तादाद भी बहुत ज्यादा होती है।


सोचने की बात है कि जब सरकार को चुनने के लिए चुनाव कराये जाते हैं तो उस वक्त ये लोग कहां के सफर के लिए चले जाते हैं समझ नहीं आतां, जिनके क्रांतिकारी पोस्टों से मन भ्रमित हा जोता है और लगने लगता है कि अबकि बार जरूर एक ऐसी सियासी पार्टी के लिए प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है जो जनसरोकारों के बोझ से बंधी गठरी भर मुद्दों को अपने कार्यकाल में पूरा कर देगी। लेकिन ये क्या फिर चुनाव फिर नई सरकार फिर पुराने मुद्दों के साथ नये मुद्दों का बोझ बढ़़ाती गठरी जो आवाम के सिर पर रख दी जाती है।


बहरहाल मुखिया नम्बर 9 तो अपनी ईमानदारी के लिए खासे चर्चा में हैं। उनके कुर्सी संभालने के साथ एक नये सियासी शब्द उनके अनुरूप तलाश लिया गया,जिसे वायुमंडल में छोड़ दिया गया था, जिसकी सुगंध से हर कोई सराबोर हैं वो था जीरो टालरेंस। लोगों को तभी लगने लगा था कि इस शब्द की तलाश बहुत सोच समझकर चतुराई के साथ की गई थी, सो लोगों के हलक से ये जीरो टालरेंस नीचे नहीं उतरा, लग गये भइया पीछे ढ़ंढने लगे कमी। तो भई इसमें बुरा मानने वाली बात क्या है, लोग तो इतने समझदार हो गये, लपक लाये मुहावरे कि चांद में भी दाग होता है।


हमारी तो सांस ही थम गई, अरे या क्या गजब हो गया ?जीरो टालरेंस में भी ये चतुर ढ़ूंढ़़ लाये दाग। लोगों ने कहना शुरू कर दिया ढ़ेंचा बीज,ढ़ेंचा बीज क्या चीज थी आखिर इसम ें? अरे भई इससे रस्सी ही तो बनती है और रस्सी का सांप अपने आप बन जाता है, तो लो जी सांप दौड़ने लगा छछुंदर के पीछे। सब के होश गुम, छछुंदर का तो पता ही नहीं है बहरहाल सांप लोगों को भयभीत करता रहा ,कईयों को लपेट दिया, नहीं बख्शे गये आईएएस। लेकिन फिर भी कई घाघ कुंडली मारे मलाईदार विभागों पर बैठे मलाई खाते रहे लपेटे जायेंगे वो भी।


आखिर बकरी की मां कब तक खैर मनायेगी।मुखिया नम्बर 9 ने कई खबर नबीसों की दुकान बंद कर दी, कई के दरवाजे बन्द, तो खबर नवीसों ने भईया नाराज होकर ले लिया ब्रह्म अस्त्र का सहारा और कर डाला स्टिंग फिर क्या बौखलाये साहब ने उन्हें पहुंचा दिया सुरक्षित जगह, लेकिन ये क्या बड़ी जल्दी ट्रैक पर आ गये। सरकार और अदालत में कह भी दिया कि अब नहीं होगी उत्तराखण्ड के स्टिंग मास्टर की उत्तराखण्ड में गिरफ्तारी। अब ये कहना मुश्किल है भईया, मास्टर घबरा गया या जीरो टालरेंस, खैर हो जो कुछ भी बाउन्सर था सटीक गुड लैंथ बॉल थी और बाल-बाल बचे लेकिन क्रीज पर सुरक्षित बैटिंग का आनन्द लतेे रहे।


शायद विपक्ष को स्टिंग मास्टर का ओछा हाथ डालना खल गया। सो एक थीं ताई-अम्मा अब परागमन कर गईं उन्होंने भी एक जोरदार बाउन्सर डाल ही दिया ये तो वही बात हो गई घोड़े की नाल ठुक रही थी, मेंढ़की ने भी अपना पैर आगे बढ़ा दिया। अब देखना ये था कि सियासी पिच पर जो स्टिंग के बाउन्सर फेंके जा रहे थे क्या इन बाउन्सरों से सरकार रूपी विकेट गिरेगा, जबकि जीरो टालरेंस कह रहे थें कि परेड मैदान में बड़ी स्क्रीन पर स्टिंग का बाउन्सर फेंको, ताकि आवाम भी देखें कि बाउन्सर पर सिक्सर लगता है या नहीं।


अरे भईया, छोटे फार्मेट में सिक्सर लगेगा या बोल्ड होंगे। ये तो बाउन्सर की क्वालिटी पर निर्भर करता है। जो कि भविष्य की गर्त में था, लेकिन इतना जरूर कहा जायेगा कि जीरो टालरेंस की धार कुन्द नहीं पड़ी थी धार को कुन्द करने के लिए इस हथियार को और धारदार बनाने की योजना अंगड़ाई जरूर ले रही थी। प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की भीनी-भीनी संुगन्ध आने लगी हर गली चौराहे पर एक ही चर्चा थी कि जीरो टालरेंस वाले जीरो होने जा रहे हैं लेकिन अचानक सियासत के मठाधीशों के दफ्तर से खबर नवीस खबर उड़ा लाये कि प्रदेश को जल्द मुखिया नम्बर 10 मिलने वाला है, लो जी खबर तो सोलह आने सच थी मुखिया नम्बर 10 ने कमान संभाल ली लंकिन ये क्या ये तो बहुत बड़े वाले निकले इनका इतिहास और भूगोल दोनों ही कमजोर निकला उड़वा दी हंसी सियासी मठाधीशों को प्रदेश से अपनी विदाई नजर आने लगी सो ढ़ूंढ़ लाये मुखिया नम्बर 11 जो युवा होने का गौरव रखते हैं सो बना दिया उन्हें बलि का बकरा और थमा दी प्रदेश की कमान फिर क्या था झण्डा डंडा उठाने वाले चीख पड़े जोर लगा के हईशा और वो भी युवा तुर्क पूरे जोश के साथ लग गये घोषणाओं का भानुमति पिटारा खोलने मे ले तेरे की दे तेरे की लेकिन सवाल ये उठता है कि आसपास विपक्षी शेर भी दांत-नाखून पैने करे बैठे हैं इतनी आसानी से प्रदेश की जनता का शिकार करने नहीं देंगे अब देखना ये है कि झाड़ू पंजा लेकर पीछे पड़े लोगों से फूल अपनी अस्मत कैसे बचाता है बचा पाता भी है कि नहीं ये तो मुखिया नम्बर 11 की काबलियत पर निर्भर करता है क्योंकि कई ज्वलनशील मुद्दों से मौजूदा सरकार बचती रही है ऐसे में बड़ी कठिन है डगर पनघट की।


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