दो दशक बाद अफगानिस्तान से हटी यूएस आर्मी

  


जैसा की अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन अमेरिकी जनता से वादा किया था कि जब वह सत्ता में आयेंगे तो अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाएंगे। बाइडन ने अपना वादा पूरा कर दिया है। 20 साल से अपने देश और परिवार से दूर अमेरिकी सैनिकों की घर वापसी हो रही हैं। अमेरिकी सेना ने करीब 20 साल के बाद अफगानिस्तान के बगराम एयरफील्ड को छोड़ दिया है। अमेरिकी सैनिकों ने अफ़ग़ान सुरक्ष बल को बगराम की जिम्मेदारी थमाई और रातोंरात एयरफील्ड को खाली कर दिया। अमेरिका के दो अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। अधिकारियों ने नाम जाहिर नहीं होने की शर्त पर बताया कि एयरफील्ड ‘अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा बल’ को पूरी तरह से सौंप दिया गया है। एक अधिकारी ने बताया कि बलों की रक्षा का अधिकार और क्षमताएं अब भी अफगानिस्तान में अमेरिका के शीर्ष कमांडर जनरल ऑस्टिन एस मिलर के पास हैं। अमेरिका द्वारा इस क्षेत्र को छोड़ने से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि अफगानिस्तान में बचे आखिरी अमेरिकी सैनिक यहां से निकल चुके हैं या इसे छोड़कर जाने वाले हैं। 

अमेरिका ने अफगानिस्तान से 90 प्रतिशत अपनी सेना हटाई

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य टुकड़ी की वापसी 90 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी है। अमेरिकी सेना कमांडर ने इस बात की घोषणा की है कि अमेरिकी सरकार के निर्देशों के बाद अफगानिस्तान में तालिबानियों से चल रहे युद्ध को विराम देते हुए सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का काम जारी है। यह खबर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बलों द्वारा बगराम एयरफील्ड छोड़ने के कुछ दिनों बाद आई है। 2001 में अमेरिकी सैनिकों ने तालिबान बलों को सत्ता से हटाने और 9/11 के हमले और हजारों अमेरिकियों की हत्या के जिम्मेदार अल-कायदा के आतंकवादियों को खत्म करने के लिए अफगानिस्तान में अपनी सेना तैनात कर तालिबानियों से युद्ध किया था। तब से लगातार अमेरिकी सेना अफगानिस्तान ने तैनात थी और तालिबानियों से युद्ध कर रही थी। 

अफगान सैन्य अधिकारियों को बिना बताए रातोंरात हटे अमेरिकी सैनिक

एसोसिएटेड प्रेस ने सोमवार को बताया कि अफगान सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी बलों ने नए अफगान कमांडर को सूचित किए बिना शुक्रवार को रात भर बेस छोड़ दिया था। अमेरिकी सैनिकों के चले जाने से "लगभग 48 घंटे पहले" बेस का वॉकथ्रू हुआ। बगराम का नियंत्रण छोड़ने से पहले अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर छह अन्य सुविधाएं अफगान रक्षा मंत्रालय को सौंप दी थीं। एसोसिएटेड प्रेस ने यह भी बताया कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के कुछ ही समय बाद बगराम में बिजली चली गई थी, जिससे भ्रम पैदा हो गया था कि लूटेरों को बेस पर और इमारतों में तोड़फोड़ करने की अनुमति दी गई थी। किर्बी ने पेंटागन में संवाददाताओं से कहा कि वह इस सवाल पर गौर करेंगे कि बिजली क्यों काटी गई।

वक्त से पहले अफगानिस्तान से हटाए गये 90 प्रतिशत सैनिक

राष्ट्रपति जो बाइडन के 11 सितंबर तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की पूरी तरह वापसी के लक्ष्य से कई दिन पहले इस काम को किया जा रहा है। अप्रैल में बाइडन की ओर से की गयी घोषणा के बाद से ही साफ हो गया था कि अमेरिका अपनी इस जंग को समाप्त कर रहा है तथा अमेरिकी सैनिकों तथा उसके नाटो सहयोगियों के करीब 7,000 जवान चार जुलाई के आसपास वापसी करेंगे। चार जुलाई को अमेरिका स्वतंत्रता दिवस मनाता है। नाटो के अधिकतर जवान इस सप्ताह प्रस्थान कर चुके हैं।

10 प्रतिशत अमेरिकी सैनिक सितंबर तक अफगानिस्तान में ही तैनात रहेंगे

अफगानिस्तान में बचे अमेरिका के अंतिम सैनिक जहां आगामी दिनों में देश छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हैं वहीं अमेरिकी अधिकारियों ने बृहस्पतिवार को कहा कि अफगानिस्तान युद्ध में उनकी सेना सितंबर तक शामिल रहेगी और अफगान बलों के बचाव के लिए तालिबान के खिलाफ हवाई हमले के विकल्प को खुला रखा जाएगा। अधिकारियों ने पहले कहा था कि अमेरिका के मुख्य सैन्य बल और इसके उपकरणों की अफगानिस्तान से वापसी का काम इस हफ्ते के अंत तक काफी कुछ पूरा हो जाएगा। वापसी के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन ने 11 सितंबर की समयसीमा तय की थी।

आलाकमान सैन्य अधिकारी भी स्वदेश लौटे

अधिकारियों ने कहा था कि अफगानिस्तान में अमेरिका शीर्ष कमांडर जनरल स्कॉट मिलर भी लौट आएंगे जो अमेरिकी मिशन में एक उल्लेखनीय परिवर्तन होगा। हालांकि कई जटिल तथ्य ऐसे हैं जिनका अर्थ है कि बीस साल से जारी युद्ध में अमेरिका का दखल अभी खत्म नहीं होगा। अधिकारियों ने बताया कि जब मिलर अफगानिस्तान से रवाना हो जाएंगे तो तालिबान पर हमले करने समेत उनके अधिकार एवं अलकायदा समेत अन्य समूहों के खिलाफ आतंकवाद निरोधी अभियान की जिम्मेदारी जनरल फ्रैंक मैक्केंजी संभालेंगे जो पश्चिम एशिया में अमेरिका के शीर्ष कमांडर हैं। 

तालिबानियों के खिलाफ जारी रहेगा हवाई युद्ध

अधिकारियों ने बताया कि हाल के हफ्तों में अफगान बलों के समर्थन में अमेरिका ने कई हवाई हमले किए हैं जो अफगानिस्तान के बाहर से आए लड़ाकू विमानों के जरिए किए गए हैं और ये हमले जारी रहेंगे। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि अफगानिस्तान में अमरिका के नए कमांडर होंगे नौसेना के रियर एडमिरल पीटर वाज्ले जो अमेरिकी दूतावास में सुरक्षा अभियान के प्रमुख होंगे। वह काबुल में हैं और मिलर के साथ काम कर रहे हैं। वाज्ले के साथ करीब 650 अमेरिकी सैनिक होंगे जिनमें से ज्यादातर राजनयिक मिशन की सुरक्षा के लिए होंगे। यह बल अफगानिस्तान में अनिश्चित काल के लिए रहेगा। इसके अलावा मैक्केंजी के पास करीब 300 और सैनिकों को अफगानिस्तान में रखने का अधिकार होगा जो हवाईअड्डे की सुरक्षा समेत अन्य सुरक्षा कदमों में मदद देंगे। पेंटागन और अमेरिका के अन्य नेताओं ने अफगानिस्तान में हाल के समय में हिंसा अधिक होने को लेकर आगाह किया है और ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि वहां पर गृह युद्ध हो सकता है तथा अफगान सरकार तथा उसकी सेना घुटने टेक सकती है। 

 अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका और तालिबानियों का युद्ध

2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर संयुक्त राज्य अमेरिका के आक्रमण के बाद से ही तालिबानियों को समाप्त करने के लिए अमेरिका के सैनिक युद्ध कर रहे थे।  यह युद्ध तब  शुरू हुआ जब संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों ने अल-कायदा को अफगानिस्तान में संचालन के एक सुरक्षित आधार से वंचित करने के लिए तालिबान को सत्ता से सफलतापूर्वक खदेड़ दिया। प्रारंभिक उद्देश्यों के पूरा होने के बाद, 40 से अधिक देशों (सभी नाटो सदस्यों सहित) के गठबंधन ने देश में एक सुरक्षा मिशन का गठन किया जिसे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ, 2014 में रेसोल्यूट सपोर्ट मिशन (आरएस) द्वारा सफल बनाया गया) कहा जाता है, जिनमें से कुछ निश्चित सदस्य अफगानिस्तान की सरकार के साथ संबद्ध सैन्य युद्ध में शामिल थे। बाद में युद्ध में ज्यादातर तालिबान विद्रोही शामिल थे, जो अफगान सशस्त्र बलों और संबद्ध बलों के खिलाफ लड़ रहे थे। SAF/RS के अधिकांश सैनिक और कर्मचारी अमेरिकी हैं। युद्ध को अमेरिका द्वारा ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम और ऑपरेशन फ्रीडम सेंटिनल के रूप में कोड-नाम दिया गया है। यह अमेरिकी इतिहास का सबसे लंबा युद्ध है।


अफ़ग़ानिस्तान  में डर का माहौल 

अफ़ग़ानिस्तान में डर का माहौल इस कदर है कि कुछ लोग देश छोड़ने को बेकरार हैं और इसके लिए उन्होंने सीमा पार कराने वाले तस्करों से भी बात कर ली है। इम्तियाज मोहम्मद (19) काबुल के खार्त-ए-नॉ इलाके में फल बेचकर रोजी-रोटी कमाता है। इस काम से उसे 13 लोगों के परिवार का गुजारा करना होता है। दो बार उसके साथ लूटपाट हो चुकी है और दोनों बार उसका मोबाइल फोन और थोड़ी बहुत हुई कमाई छीन ली गयी। वह और उसके चार दोस्त चार दिन बाद अफगानिस्तान छोड़कर चले जाएंगे। उन्होंने ईरान या तुर्की जाने को लेकर सीमापार कराने वाले तस्कर को धन भी दे दिया है। मोहम्मद के सात दोस्त पहले ही तुर्की के लिए निकल चुके हैं। उसने कहा, ‘‘यहां कोई नौकरी नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। हर जगह चोर हैं। मैं गुजारे की कोशिश कर रहा हूं लेकिन कर नहीं पा रहा।’’ अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना और नाटो बलों के जवानों पूरी तरह वापसी के बीच अफगान नागरिकों के बीच हताशा का माहौल है। अफगानों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बल उनके देश को कंगाल हालत में छोड़कर जा रहे हैं जो एक और असैन्य जंग के कगार पर है। उनके मुताबिक यहां कानून व्यवस्था की हालत भी बदतर है। काबुल के सिटी सेंटर में तुर्किश वीजा केंद्र के बाहर सड़क पर अमीर लोगों की कारों की कतार लगी है जो देश छोड़कर जाने के लिए वीजा बनवा रहे हैं। 

अमेरिकी सैनिकों की पूरी तरह वापसी की घोषणा के बाद से काबुल में तुर्की के दूतावास में वीजा के हजारों आवेदन आये हैं। अन्य दूतावासों में भी वीजा के आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ गयी है। काबुल पॉलीटेक्निक विश्वविद्यालय के व्याख्याता अब्दुल्ला सईद विदेश में एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए वीजा आवेदन कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे लोग सोच रहे हैं कि एक असैन्य युद्ध शुरू हो सकता है और इसलिए लोग देश छोड़कर जाना चाहते हैं।’’ अफगानिस्तान के नेता और अन्य प्रमुख लोगों में से अधिकतर के पास अफगानिस्तान के अलावा अन्य देशों के पासपोर्ट हैं और उनके परिवार अक्सर विदेश में रहते हैं।