शिक्षा के गिरते स्तर के लिए बाजारवाद जिम्मेदार

 

  ज़ीशान अहमद सिद्दिक़ी  

 

 मैल्कम का कथन है ‘‘ शिक्षा भविष्य का पासपोर्ट है,क्योंकि आने वाला कल उनका है जो उसके लिए आज से तैयारी करते हैं’’ लिहाजा नौनिहालों का भविष्य तभी सुधरेगा जब शिक्षा अच्छी मिलेगी लेकिन दुर्भाग्य है कि शिक्षा का स्तर दिनो-दिन गिरता जा रहा है ऐसे में नौनिहालों के भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। दरअसल शिक्षा एक मुसलसल चलने वाली प्रक्रिया है,जो मनुष्य के जीवन से लेकर मरण तक साथ रहती है। मनुष्य इसी प्रक्रिया से होकर गुजरता है और कुछ न कुछ सीखता है, लेकिन तमाम परिभाषाओं को मिलाकर हम तलाशे तो शिक्षा का अर्थ नहीं मिलेगा जो अपने आपमें मुकम्मल हो। ये दुःखद है कि आज शिक्षा का मूल अर्थ हमसे दूर चला जा रहा है अब  शिक्षा में न संस्कार ही बचे हैं और न ही व्यवहार। अगर हम ये कहें कि शिक्षा का स्वरूप अव्यवस्था,अराजकता और कल्पनाहीनता के दायरे में सिमट रही है तो शायद गलत नहीं होगा। आलम ये है कि आज के दौर में न तो शिक्षा के जरिये आचरण न चरित्र न मानवीय मूल्य और न ही नागरिक संस्कार देखने को मिल रहे हैं, फिर एक मजबूत राष्ट्र की कल्पना करना बहुत मुश्किल है जिसकों लेकर लोंगों की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें खिंचना स्वभाविक हैं। आज शिक्षा को लेकर बहस का मौजू खुला हुआ है जिस पर लम्बे-चैड़े भाषणों के कई दौर गुजर जाते हैं लेकिन आखिर में इसका ठीकरा जाकर शिक्षक के सिर ही फूटता है जो बहुत कष्टकारक होता है। यदि आप मानवीय आधार पर आंकलन करें तो देखेंगे कि सियासी कुंडली के दायरे में शिक्षक बच्चों को शिक्षा देने के बाद जनगणना,आर्थिक जनगणना, वाल जनगणना,मतदाता पहचान पत्र, वोटर लिस्ट,पशु गणना,पल्स पोलियों अभियान के साथ चुनावी डयूटी करना और मतगणना तक अपना कार्य पूरी तन्मयता से करता है फिर वो नकारा और अयोग्य कैसे हो सकता है? खैर ये बात तो सर्वविदित है कि शिक्षक खुद उस शिक्षा की पैदावार है उसके लिए जहां तक संभव हो रहा है वो छात्रों को नैतिक मूल्यों, आदर्शों के साथ छात्रों को सामाजिक उत्तरदायित्व से रू-ब-रू कराता है। सवाल ये उठता है कि शिक्षा के गिरते स्तर और शिक्षा की गुण्वत्ता के लिए उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है इसके लिए कौन दोषी है ? क्योंकि इस पर न तो राजनीतिक और न ही सामाजिक मंथन गंभीरता के साथ हो रहा है। शिक्षा को लेकर दोषारोपण से बेहतर है कि उस पर आत्मचिंतन किया जाये यदि ये बात कही जाये कि शिक्षा का स्तर तेजी से गिर रहा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज स्कूलों में छात्रों को आजीविका और पाठयक्रम की शिक्षा दी जाती हैे,ं ऐसे में छात्रों के मानसिक,वौद्धिक और आध्यात्मिक विकास को नजर अन्दाज कर दिया जाता है। अगर हम ये कहें कि वर्तमान में जो शिक्षा बच्चों को दी जा रही है वो सिर्फ और सिर्फ वौद्धिक श्रम को ही तरजीह देती हैं । आप देख ही रहे है कि कम्पटीशन में एग्जाम होते ही इसलिए हैं कि कौन सा छात्र कितनी इन्फार्मेंशन को एक साथ कैप्चर करके चल रहा है, ये ही वजह है कि जिन छात्रों ने आधुनिक टैक्नोलाजी का अच्छा अभ्यास किया हुआ होता है वही प्रतियोगिता अपने नाम करा लेता है। मैं जो कहने जा रहा हूं वो शायद कड़वी बात लगे लेकिन जो सामने आ रहा है वो तो कहना ही पड़ता है, क्योंकि इस प्रवृत्ति के बुरे नताइज भी देखने को मिल रहे हैं कि समाज-सेवा और प्रशासन में ऐसे लोग आ रहे हैं जिन लोगों ने कभी न तो समाज सेवा करी और न सेवा के संस्कार ही मिले ऐसे लोगों का एक ही मकसद होता है सिर्फ नौकरी में जाकर पैसा कमाने के रास्ते तलाशना । उन्हें फिर सेवा, विकास, आत्मा का विकास और एक अच्छे इंसान की बात व्यर्थ और उपहासजनक लगती है,उन्हीं रास्तों से गुजरकर शिक्षक भी जाते हैं जो पूरे शिक्षक समुदाय को नकारा बताने के लिए काफी है। आज शिक्षा धनाढय लोगों की मुठठी में कैद है आज के दौर में पैसा ही सब कुछ है पैसे वाले को ही शरीफ होने का तमगा हासिल है, धनवान को ही अच्छे घर का माना और जाना जाता है फिर धन की चकाचौंध में संस्कार विलुप्त हो जाना बड़ी बात नहीं है। दूसरा सबसे बड़ा कारण वो जो शिाक्षा के गिरते स्तर का कारक भी है क्योंकि आजं परंपरागत व्यवसायों का खत्म होना भी एक बहुत बड़ा कारक है। जब से देश के अन्दर आद्यौगिकीकरण की आंधी आई है ऐसे में प्रशिक्षित कर्मचारियों का निर्माण की जिम्मेदारी भी शिाक्षा पर ही आ गई है । बहरहाल गिरते शिक्षा के स्तर के लिए शिक्षकों को दोष देना ठीक नहीं है, उदारण के तौर पर 190 बच्चों वाले स्कूल में जाकर दो दिन बिताइये यकीन के साथ कह सकता हूं तीसरे दिन आपके कदम स्कूल तक नहीं जायेंगे इसलिए शिक्षकों की आलोचना से बचे वल्कि उन परिस्थितियों के बारे में गौर करें जिससे होकर शिक्षक गुजरता है। आज शिक्षा बाजारीकरण का दंश झेल रही है ऐसा नहीं है कि शासन गंभीर नहीं है वल्कि कई योजनाऐं शिक्षा की बेहतरी के लिए चलाई जा रही है लेकिन उसकी दशा और दिशा के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं, वहीं शिक्ष्कों की बेहतरी के लिए सरकार की तरफ से सकारात्मक कदम न उठाना भी शिक्षा के गिरते स्तर का मुख्य कारण है।