कोरोना संकट-सरकार के प्रयासों के बीच खलल न पैदा करें

 

 

सलीम रज़ा


पिछले साल जिस तरह से कोरोना ने अपना तांडव मचाया था जिसमे न जाने कितने लोगों को इस त्रासदी या फिर अपने गंतव्य को लौटने की जल्दबाजी में अपनी जान से हाथा धोना पड़ा था, अभी अपनों से अपनों के बिछड़ने का गम कम भी नहीं हुआ था कि एक बार फिर कोरोना ने लोगों को निगलना शुरू कर दिया। एक बार फिर हिन्दुस्तान के अधिकांश राज्यों में कोरोना का आतंक मचा हुआ है। दिन पर दिन हालात बिगड़ रहे हैं हालांकि सरकार भी पूरी तरह से इस महामारी से निपटने के लिए तैयार है । ऐसे संकट की घड़ी में देश की जनता का दायित्व बनता है कि वो सरकार के कदम से कदम मिलाकर चलें और अपनी सहभागिता दर्ज कराकर एक अच्छे नागरिक होने का परिचया दे। आज शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे इस महामारी का खौफ न सता रहा हो। देश का अधिकांश इंसान इस महामारी से निपटने और अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने के चक्कर में डिप्रेशन का शिकार हो रहा है। इस महामारी से जहां पूरा देश ठहर गया था लेकिन इस बार आये नये स्ट्रेन को लेकर शायद देश के नीति निंयता बेखबर थे वो इसलिए कि पिछले साल लाकडाऊन के बाद धीरे-धीरे अनलाक की प्रक्रिया अपनाई गई थी जिससे देश की अर्थव्यवस्था  पटरी पर आने लगी थी और जन जीवन भी सामान्य हो चला था। यहां मैं कुछ तथ्य के साथ अपने लेख को आगे बढ़ाऊंगा जो शायद कुछ को ठीक न लगे लेकिन किसी भी बात को सियासत के चश्मे से नहीं देखना चाहिए आप हिम्मत रखें सच को सच और गलत को गलत कहने की और सरकार भी आमजन की राय मांगती ही है लेकिन अन्त में फैसला सरकार को अपने विवेक से करना होता है और विवेक की तुला धर्मकांटे के समान होती है जिसमें फैसला आम जनता को होने वाले नुकसान से कैसे बचाया जाये ये देखकर ही किया जाता है, न कि स्वार्थ की भावना रखकर आम जनता को अंधेरे कुंऐं मे धकेलने जैसा।


ये तो सभी जानते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर पिछली कोरोना लहर से कहीं ज्यादा खतरनाक है वो इसलिए नहीं कि कोरोना का नया स्ट्रेन ज्यादा खतरनाक है वल्कि इस लिहाज से इसके लिए हम खुद जिम्मेवार हैं वो यूं कि हमने ही सारे नियम-कायदे  सर्तकता और परहेज को हाश्एि पर डालकर अपनी स्वर्थ सिद्दी मे लग गये। हम भूल गये कि हमारे पास संसाधन सीमित हैं लिहाजा हमे महामारी के आर्थिक,मानसिक और शारीरिक पहलुओं को किसी भी हाल मे नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए था। हमारी इसी भूल ने इसे महामारी का रूप दिया है। रही बात सरकार की तो वो इस महामारी को लेकर कितनी संवेदनशील रही है ये हम देख ही रहे हैं। शायद ही कोई इस बात को भूला हो कि जब देश के अन्दर पहली बार कोरोना ने दस्तक दी थी उस वक्त हमारे योग्य प्रधानमंत्री जी ने ताली, थाली टार्च बजवाकर जलवाकर लोगों को कोरोना भगाने का मंत्र दिया साथ ही दो गज की दूरी मास्क है जरूरी का संदेश भी जनता को देना नहीं भूले लेकिन आपने देखा होगा ताली,थाली,टार्च मोमबत्ती इन सभी क्रियाकालापों में न तो सोशल डिस्टेंसिंग दिखी और न ही लोगों की भीड़ ने मास्क पहना था, ये शुरूवाती दिनों की बात थी हां सड़कों पर दूसरे राज्यों से पलायन करके अपने वतन लौट रहे प्रवासियों पर पुलिसिया कहर या फिर जरूरी काम के लिए घर से बाहर निकलने वालों पर पुलिस की लाठी देखने को मिली थी ये था हमारी सरकार का प्रशासन को आदेश जो आमजन को कोरोना से बचाव के लिए जागरूक करने वाला था। अब ये कहना कितना सही होगा कि ये सख्ती आमजन को कोरोना संक्रमण से बचाने की थी या लोगों में भय बैठालकर मनमाना शासन करने की ये तो सरकार और उसके गुलाम प्रशासन को ही मालूम होगी।

अब बात करते हैं इस साल यानि 2021 की तो सरकार को दूसरे स्ट्रेन की खबरे और विशेषज्ञों की चेतावनी सुनने को मिल ही रही थीं फिर भी हमारे देश की न्यायपालिका ने सरकार की मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया। वैसे तो उच्च और उच्चतम न्यायालय स्वयं संज्ञाान लेते हैं लेकिन सरकार की मनमानी पर मौन क्यों हो गया ये एक  सोचने वाली बात है। दर असल हिन्दुस्तान में आस्था भारी पड़ जाती है चाहें पर्यावरण हो या फिर महामारी ऐसा ही कुछ देखने को मिला इस कोरोना काल के दौरान, देश का सबसे बड़ा सैलाब हरिद्वार का कुंभ था जिसके आयोजन को लेकर लोगों की राय भी जुदा थीं लेकिन ज्यादातर लोगों ने असकी आलोचना करी थी। इतना ही नहीं विदेशी मीडिया में भी मोदी सरकार की फजीहत हुई है उस पर सोने पर सुहागा कि पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव का कराया जाना भी सरकार की इस महामारी के दौर में असंवेदनशीलता दर्शाती है। सबसे पहले तो पांच राज्यों में संपन्न होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर है जिसमें हमारे देश के दिग्गज राजनेताओं ने रैलियां की थीं रैलियां यानि रेला जनता का सैलाब जिसमे कोविड नियमों की किस तरह घाज्जियां उड़ाई गईं ये शायद किसी से छिपा नहीं है, क्या सरकार के मुखिया जो हर माह देश की जनता को मन की बात करते नजर आते हैं उन्होंने सोचा की देश की जनता पहले है या चुनाव क्योंकि लोक से ही लोकतंत्र है और लोकतंत्र से ही सरकारें चला करती हैं जब लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो आप कैसे राज करेंगे। अगर मैं ये कहूं कि देश में कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है और आप चुनावी रैलियों में व्यस्त हैं तो ये एक तानाशाह की निशानी है जो इंसानों की लाश पर बैठकर सियासत खेल रहा है। आप वर्चुअल रैली कर सकते थे लोगों को आप सड़कों पर लाकर भाजपा का शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं न मास्क की फिक्र न सोशल डिस्टेंसिंग की चिन्ता ये था तो था क्या? पश्चिम बंगाल में न जाने ऐसे कई केस सामने आयेंगे जो मतदाता अपना आखिरी मतदान करने वालों में अपना नाम लिखवा चुके होंगे । दुःखद और शर्मनाक है ,लेकिन कहने में कोई गुरेज भी नहीं कि चुुनाव आयोग लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के लिए नहीं वल्कि सरकार की गुलामी करने के लिए हुआ करता है।

कोविड के बढ़ते संक्रमण के बीच क्यों चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने की अनुमति दी इतना ही नहीं सरकार ने लगे हाथ पंचायत चुनाव भी करवा दिये ये सरकार की असंवेदनशीलता और तानाशाही की निशानी है। हरिद्वार कुभ में लाखों लोगों ने स्नान किया जिससे संक्रमण की स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक हो गई नतीजा ये हुआ कि आज देश में जो भी हालात हैं उसकी जिम्मेवार सरकारें ही है। देश को अनलाक करने के बाद सारे आयोजनों को करने के लिए न कोई समय सीमा और न हीं लोगों के जमावड़े को रोकने की सख्ती थी जिसका परिणाम अब देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियों में लाखों की भीड़ का जमा होना और देश के बड़े नेताओं का वगैर मास्क के रैली को संबोधित करना वो भी मंच पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करते हुये देख कर अचरज हुआ, सिर्फ एक हवा में सवाल तैर गया कि सच में इंसानी जिन्दगी से बड़ी सियासत है। उस पर सोने पर सुहागा हरिद्वार का महाकुंभ भा जिसमें गंगा में लाखों लोगों ने स्नान किया जहां पर सोशल डिस्टेंसिंग बनाये रखना नामुमकिन ही था जिसके बाद उत्तराखण्ड के साथ और राज्यों के हालात बेकाबू हो गये जिसका परिणाम सामने है। उत्तराखण्ड में चारो तरफ त्राहिमाम-त्राहिमाम है। ये बात तो समझ में आती है कि भारतीय जनता पार्टी ने कुंभ आयेजन को संपन्न कराने के लिए आने वाले 2022 विधान सभा चुनाव के लिए जमीन तैयार करी क्योंकि मोदी एण्ड पार्टी अपने धार्मिक नेताओं को किसी भी हालत में नाराज नहीं करना चाहती थी  इसलिए कुंभ मेले के आयेजन की परमीशन दी खैर जो होना था हो गया लेकिन ये इंसान की जिन्दगी से खेलने जैसा था बीमारी या वायरस का धर्म से लेना-देना नहीं होता,लेकिन आज शमशान और कब्रिस्तान की भीड़ इस बात की गवाही दे रही है।

बस अब आपको संयम से काम लेना होगा आप खुद इस महामारी से लड़ने में अपना योगदान  सरकार के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर दें, सरकार  अथक प्रयास कर रही है लेकिन सब कुछ करने का दायित्व सरकारों का भी नहीं बनता है। देखा ये जा रहा है कि ज्यादातर लोग सरकार को कोसने का जैसे ठेका ले बैठे हो इस तरह की छदम्य राजनीति करने से लोग बाज आये सकारात्मक सोच के साथ सरकार का सहयेग करें क्योंकि हमें सरकार नहीं वल्कि इंसानों को बचाना है। अबकी बार जिस तरह से हमारे ऊपर कहर टूटा है उसके लिए शायद हमारी सरकार और हम तैयार नहीं थे। अगर मैं ये कहूं कि कोरोना जैसी महामारी उचित प्रबन्धन के अभाव में ही ज्यादा पनपती है लिहाजा ये सरकारी प्रबन्धन नही होता वल्कि देश के हर इंसान का दायित्व है कि वो अपने परिवार का प्रबन्धन देखे जिस पर हमने पिछली दफा भुगतने के बाद भी शायद ध्यान नहीं दिया। हो सकता है हम ज्यादा ओवर कान्फिडेंस अपने अन्दर ले बैठे थे इसीलिए सारे नियम कानून को अपनी जागीर समझ बैठे। हमें इस बात को ध्यान रखना चाहिए था कि जब महामारी अपना रौद्र रूप ले लेती है तो सारी सरकारी और गैरसरकारी व्यवस्थायें अस्त-व्यस्त हो जाती हैं, जो हालात इस वक्त हैं आप देख ही रहे हैं। हम भुक्त-भोगी होकर भी अपने निजी और पारवारिक प्रबन्धन को लेकर शून्य ही हैं क्योंकि हम इस गफलत में रह गये कि हम सेफ हैं, अनावश्यक जमावड़े से भी हमारा खौफ निकल चुका था अगर हमने स्वयं खतरे को भांप कर एहतियात बरती होती तो शायद इस महामारी की जद मे आने से बच सकते थे।

अब सवाल ये उठता है कि जब हम पहले ही दौर में वफल हो गये तो फिर हम किस मुह से व्यवस्था पर उंगली उठा सकते है,क्योकि हमने दो गज की दूरी मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कड़ाई से नहीं किया वरना इस महामारी की चपेट में ें आने से बचा जा सकता था। बेहतर प्रबंध ही हम और हमारे परिवार को बचा सकता था वरना कुप्रबंधन महामारी को बढ़ावा ही देगा और कोई भी वयवस्था इस बोझ को ज्यादा समय तक नहीं सह पायेगी। यहां एक बात कहना सही समझता हूं मान लीजिए सरकार भाजपा की न होकर और किसी पार्टी की होती तो क्या ये दशा नहीं होती, ऐसा ही होता क्योंकि हम खुद इसके जिम्मेवार हैं सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने से बेहतर होगा कि हम सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर इस महामारी से लड़ने में सहयोग करें कोविड नियमों का अक्षरशः पालन करें मास्क लगाये सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें तभी अपने आपको और दूसरों को बचाया जा सकता है।  


Sources:Saleem Raza