बरकतों वाला है रमज़ान मुबारक का महीना



ज़ीशान सिद्दिकी

इस्लामिक धार्मिक परम्पराओं के मुताबिक हर मोमिन बन्दे पर रोज़े रखना फर्ज़ हैं, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से उसके लिए पांचो वक्त की नमाज़ पढ़ना फर्ज़ है। पूरी दुनिया में इस्लाम घर्म के मानने वालों के लिए माहे रमज़ान का पाक और मुकद्दस महीना किसी त्योहार से कम नहीं है। इस्लाम धर्म की पाबन्दियों के मुताबिक सिर्फ सहरी खाकर रो़ज़ा रखना या भूखे प्यासे रहकर रोज़ा रखना इस्लामी परम्परा के खिलाफ है, बल्कि रोज़े के दौरान कुछ ज़हनी और अमली बन्धन पर भी ज़ोर दिया गया है। इस माह की फज़ीलत ऐसी है कि हर मोमिन सोचे कि पूरे साल रोज़े क्यों नहीं होते इस मुकद्दस माह में अल्लाह की रहमत अपने बन्दों पर बरसती है लिहाजा रोजे हर उस मुसलमान मर्द व औरत पर वाजिब है जो अक्ल और सेहतयाफ्ता हो उसे हर साल रमज़ानुल मुबारक के महीने में एक माह के रोज़े पूरी कसरत के साथ रखना जरूरी है। जो मुसलमान अक्ल और सेहत से तन्दरूस्त है और जानबूझकर रोज़ा नहीं रखता एक तो वो शख्स अल्लाह की रहमत से महरूम रह जाता है और अल्लाह के हुक्म की नाफरमानी करके रोज़ा नहीं रखता वो गुनाह-ए-कबीरा करता है। रोज़ेदार के लिए सबसे बड़ी बात है कि उसे रोज़े के दौरान अपने जिस्म के हर एक अंग पर या अपनी नफ्स पर काबू रखना होता है। यानि हर हाल में रोजा रखने वाला अपने आंख,कान,ज़ुबान का भी गलत इस्तेमाल करने से परहेज करे यानि हर मोमिन बन्दे में परहेजगारी करने का बेहतरीन जरिया है। हर मोमिन अल्लाह की रज़ा लिए साल मे एक बार भुखे प्यासे रहकर रोजे रखता है उसकी इबादत करता है बेशक रमज़ान का पाक महीना हर मुसलमान के सब्र का इम्तिहान है। माहे रमज़ान की फजीलत का क्या कहना अल्लाह अपने बन्दों के लिए जन्नत के दरवाज़े खोल देता है और अपने नेक काम करने वाले बन्दों को नेकियों से मालामाल कर देता है। लिहाजा मुसलमान के लिए रमज़ान का ये मुकद्दस महीना हर पल हर लम्हा नेकियों का है शर्त ये है कि वो अल्लाह के फरमान और उसकी पाबन्दियों को सिद्दत के साथ पूरा करे। माहे रमजान को तीन हिस्सों में जिसे अशरा कहा जाता है तकसीम किया गया है, पहला अशरा रहमत दूसरा अशरा मग़फिरत और तीसरा अशरा जहन्नुम से निजात का है आलिमों ने तीसरे अशरे की अहमियत ज्यादा बतलाई है।  मजहब इस्लाम के पांच अरकानों मे से रोज़ा भी एक रूकुन है ये वो पाक महीना है जिस महीने मे जिसमें अल्लाह ताला ने अपनी पाक और मुकद्दस किताब कुरान शरीफ अपने बन्दों की रहनुमाई के लिए इस जहां मे उतारा। इस पाक और मुकद्दस माह मे अल्लाह तबारक ताला अपने बन्दों के लिए जन्नत के दरवाजे खोल देता है और दोजख के दरवाजे बन्द कर देता है। इस पूरे माह शैतान कैद मे रहता है अल्लाह तबारक ताला इस महीने में नफ्ली काम करने पर फर्ज का सबाब अता करता है और फर्ज़ करने पर सत्तर फर्ज़ों का सबाब अता फरमाता है। इस मुकद्दस महीने में इशां की नमाज़ के बाद बीस रकाअत तराबीह पढ़ाई जाती हैं। तराबीह की बीस रकाअत नमाज़ इस्लाम के दूसरे खलीफा हज़रत उमर फारूख रदी अल्लाह ओ ताला अन्हु के दौेर से है इसमें पूरे माह में पूरा कुरान शरीफ सुनाया जाता है यह इबादत नफिल इबादत की सुन्नत-ए-मुअक्किदा है लिहाजा जानबूझकर तरबीह की नमाज़ छोड़ देना गुनाह है। मजबूरी मसलन बुढ़ापा,कमजोरी,मुसाफिर और बीमारी की हालत में छोड़ सकते हैं। रमज़ान में पूरे तीस दिन तराबीह पढ़ने का हुक्म है कभी-कभी ऐसा होता है कि कुरान शरीफ 28 या 29 दिनों मे मुकम्मल हो जाता है ऐसे सूरतेहाल मे पूरे तीस दिन तराबीह पढ़ना जरूरी है। लिहाजा हर मुसलमान को कसरत के साथ तीसों रोजे रखना चाहिए और हर अशरे के सबाब से मालामाल होना चाहिए क्योंकि पहले अशरे में जो रहमतों का है अल्लाह की इबादत करें और अल्लाह की रहमतों से मालामाल हो जायें क्योंकि इस अशरे में ही सबसे ज्यादा रहमत बरसती है। वहीं दूसरा अशरा मगफिरत और तीसरा अशरा निजात का है, इस पूरे महीने में एक नफाविल का सबाब फर्ज के बराबर और फर्ज का सबाब 70 गुना कर दिया जाता है वहीं पूरे माह ज्यादा से ज्यादा कुरान शरीफ की तिलावत करनी चाहिए क्योंकि अल्लाह तबारक ताला को कुरान शरीफ की तिलावत करने वाले और कुरान शरीफ पढ़ने वाले और सिखाने वाले लोग बेहद पसन्द हैं।