भाजपा का मिशन बंगाल- ममता के ‘किले’ पर ‘भगवा’ सेना का हमला

सलीम रज़ा / सियासत का भी अपना अजीब खेल है जिसमे लड़ाई भी है तो मेल के लिए रास्ते भी खुले होते हैं, जिसमें पतवार बना मतदाता जिसे इतना भी नहीं मालूम कि मुद्दे क्या होते हैं? ओर हमारे देश मे क्या चल रहा है उसे तो सिर्फ लच्छेदार बात करने वाली ओर सब्ज़ बाग दिखाने वाली पार्टी मे ही अपना भविष्य संवरता और सजता हुआ नज़र आता है और वो उसी की नाव को सियासी भंवर से निकालने मे अपना दम-खम लगा देता है। खैर ये तो सियासत के दांव-पेंच हैं अब चुनाव मुद्दे पर कम और तुष्टिकरण,धार्मिक और जातीय समीकरण पर ज्यादा लड़े जा रहे हैं। देश के हालातों से हर कोई भली-भांति परचित है जहां है कुछ और दिखाया और कुछ जा रहा है, देश के अन्दर कई राज्यों के विधान सभा चुनाव हो चुके हैं परिणाम नकारात्मक होते हुये भी सकारात्मक कैसे हुए ये सवाल एक अनसुलझी गुत्थी बना हुआ है, और शायद जल्द सुलझे या न सुलझे लेकिन आहत होते लोकतंत्र मे ऊबाल के तापमान का पैमाना शून्य ही क्यो नजर आता है ये एक विचरणीय मुद्दा है। उफ्फ मैं भी क्यों अपने रास्ते से भटक गया जमाना तो सीधे-सीधे कहने का है यूं घुमा फिराकर बात करना बेकार है जब बात मुद्दे की चल रही है तो फिर असल मुद्दे पर आ ही जाऐं चलिए रूख करते हैं ‘सोनार बांग्ला’ यानि पश्चिम बंगाल की तरफ जहां ममता दीदी के किले को भागवा धारियों ओहो यानि भाजपा ने घेर लिया है और बेचारी दीदी ने अपने तरकश से वो सारे तीर निकाल लिए हैं जो असरकारक और अचूक ही होंगे। पश्चिम बंगाल में इस बार परिस्थितियां पिछले विधान सभा चुनावों के मुकाबले कुछ अलग है। जहां एक तरफ पश्चिम बंगाल में भाजपा किसी ऐसे चेहरे की तलाश मे है जो अपनी पकड़ मजबूत रखता हो लेकिन शायद अभी तक ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया क्योंकि भाजपा बंगाल का चुनाव हर बार की तरह मोदी को लेकर लड़ रही है, इसलिए बर्तमान चुनाव टी.एम.सी बनाम भाजपा न होकर ‘मोदी बनाम ममता’ हो चुका है। दरअसल भाजपा ने अब तक जो भी चुनाव लड़े हैं वो सब मोदी के नाम पर ही लड़े हैं लेकिन बंगाल मे मोदी और ममता की टक्कर है और दोनो ही सक्षम और ऊंचे दांव खेलने वाले हैं,ऐसे मे सवाल ये उठता है कि क्याा भाजपा इन हालातो मे सीधी भिडंत का जोखिम उठाने को तैयार हो जायेगी? मेरी समझ से ये नामुमकिन है क्योंकि अगर मोदी बंगाल मे पराजित हो गये तो भाजपा के पतन की पटकथा यहीं से लिखनी शुरू हो जायेगी। मैं यहां इस बात को कहना ठीक समझता हूं क्योकि पिछले कई चुनावों को मैंने देखा है जैसे 2014 का आम चुनाव मोदी लहर के नाम से मशहूर था और उसमे भाजपा को मोदी लहर से फायदा पहुचा और वो सत्ता के सूखे को खत्म करने में कामयाब हुई, फिर जितने भी चुनाव हुये सब मोदी के ही नाम पर भाजपा ने लड़े थे। भाजपा पार्टी वन मैन आर्मी बन गई जिसके कन्धे पर सवार होकर वह चुनावी बैतरणी पार करती चली गई । लेकिन उसका तिलस्म तब टूटा जब 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा ने प्रयोग के तौर पर किरण बेदी को चुनावी समर मे उतारा हश्र ये हुआ कि भाजपा को अपनी मुंह की खानी पड़ी। दोबारा चुनाव में भाजपा ने फिर अपना तुरूप का पत्ता यानि मोदी नाम का सहारा लिया लेकिन हश्र वही हुआ जो किरण बेदी के साथ हुआ था। ये चुनाव भाजपा के लिए एक इश्यू बन गया था शायद भाजपा केजरीवाल से मिले उस जख्म को कभी न भूल पाये। ऐसे ही कुछ हालात फिलहाल बंगाल मे बने हुये हैं क्योकि उसके आगे असमंजस के हालात बने हुये हैं वहां भाजपा को कोई दमदार चेहरा नहीं मिला जिसे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया जा सके और मोदी को फिलहाल दूर रखा जाये लेकिन हाल-फिलहाल भाजपा अपनी रणनीति बना नहीं पाई है। और प्रदेशों के मुकाबले पश्चिम बंगाल का चुनाव बेहद क्रिटिकल है ममता के लिए भी और भाजपा के लिए भी। देखा जा रहा है जिस तरह से भाजपा के दिग्गज नेता बंगाल में ममता का किला ध्वस्त करने की फिराक मे हैं वहीं ममता बनर्जी अपने घर मे ही परेशान नजर आ रही है उसका कारण है कि टी.एम.सी के कई बड़े नेता ममता का दामन छोड़ चुके है, वाबजूद इसके ममता बनर्जी भाजपा और केन्द्र की सरकार पर निरंतर हमलावर हैं उसे देखकर साफ लगता है कि बंगाल का ये चुनाव ममता के लिए करो या मरो से कम नहीं होगा । अगर हम बात करें ममता के पिछले रिकार्ड को लेकर तो ममता भी दमदार नेत्री रही है जिन्होंने बंगाल से वाम दल को धाराशायी करके सत्ता छीनी थी वो चुनाव शायद ही कोइ्र भूल पाये । लेकिन इस बार असदउद्दीन ओवेसी और पीरजादा अब्बास फैक्टर भी बंगाल की सियासत को प्रभावित करेगा अब इसका फायदा ममता को मिलेगा या मोदी को ये देखने वाली बात होगी। इस बार कई फैक्टर हैं जो चुनावी समीकरण को उलट सकते हें। बहरहाल 294 सीटों वाली बंगाल विधानसभा में पिछले चुनाव मे टी.एम.सी यानि ममता की पार्टी ने 211 सीटें जीतकर अपना दबदबा कायम किया था लेकिन तब फैक्टर का खेल नहीं था, लेकिन वर्तमान का चुनाव फैक्टरों के इर्द-गिर्द चककर लगा रहा है। पहला फैक्टर तो अब तक के हालात देखने पर सामने आया कि इस बार बंगाल में जातीय फैक्टर नजर आ रहा है जो पहले नहीं था। भाजपा का थिंक टैंक बेहद एक्टिव है और भाजपा जातिय समीकरण साधने में लग चुकी है गौरतलब है कि बंगाल के अन्दर मतुआ समुदाय की संख्या बहुत बड़ी है और ये तकरीबन 70 विधान सभाओं में हैं। मतुआ समुदाय बंगाल मे अनुसूचित जनजाति वाली आबादी का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है, जिसे साधने के लिए भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह होमवर्क करने मे जुटे है। आपने देखा होगा कि भाजपा के ज्यादातर नेता मतुआ समुदाय के घर जा रहे हैं यहां तक कि उनके घर भोजन भी कर रहे हैं उसके पीछे कारण था वो ये कि सी.ए.ए के तहत नागरिकता दिलाने का मकसद यानि एक तीर से दो निशाने गरज ये है कि 70 सीटों पर मतुआ समुदाय के करीब 1.5 करोड़ मतदाता रहते हैं उसके अलावा कुर्मी और आदिवासी समुदाय के लोग भी निवास करते हैं लिहाजा भाजपा का पूरा फोकस जातीय समीकरण साधने का है हालांकि पिछले चुनाव मे ममता ने यहां पर क्लीन स्वीप किया था लेकिन इस बार समीकरण जटिल हैं जो ममता के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। हालांकि बंगाल मे एक बात तूल पकड़ी हुई है वो है ममता द्वारा भाजपा को बाहरी बताना तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा बंगाल की धरती पर महानायकों का सम्मान ओर बखान करके अपनी सियासत चमकाने की कोशिश मे लगी है। गरज ये है कि इस बार बंगाल चुनाव में स्थानीय और बाहरी मुद्दा गर्म है तो वहीं ममता ने ‘बंगाल की बेटी’ का नारा दिया है देखना ये होगा कि ये नारा ममता के लिए कितना कारगर रहेगा। दूसरा फैक्टर भी अहम है वो है मुस्लिम मतों का जिस पर ममता की खासी कमांड रही है लेकिन एन.डी.ए की अटल सरकार मे जाने के बाद ममता ने इनका विश्वास खो दिया था। वहीं दो ऐसे शख्स हैं जो बंगाल में मुस्लिमो पर खासी पकड़ रखते हैं वो हैंे असदउद्दीन ओवैसी और पीरजादा अब्बास सिद्दिकी आपको बता दें साल 2011 और 2016 में पीरजादा अब्बास ने ममता का साथ दिया था लेकिन इस बार उनका ममता से मोहभंग हो गया और उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली अब कांग्रेस की निगाह पीरजादा की पार्टी के साथ गठबन्धन करके मुस्लिम वोटों पर सेंध लगाने की है जो ममता को नुकसान पहुंचा सकता हैं हालांकि इस बात के संकेत बंगाल कांग्रेस के नेता अब्दुल मान ने भी दिये हैं कि कांग्रेस और पीरजादा की पार्टी से गठबंधन संभव है। लिहाजा बंगाल चुनाव मजेदार होगा लेकिन फिर भी मुख्य लड़ाई ममता बनाम मोदी ही होने वाली है आपको बता दें कि भाजपा बंगाल मे पहले से और ज्यादा मजबूत हुई है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा दो सीटों पर सिमट कर रह गई थी। लेकिन उसके बाद भाजपा ने यहां पर मेहनत करके अपना जनाधार बढ़ाया है इसी का नतीजा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर ये साबित भी कर दिया इतना ही नहीं इस चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 40 फीसद रहा तो वहीं टी.एम.सी का मत प्रतिशत 43 फीसद रहा था, यहां एक बात बताना जरूरी है कि भाजपा के मत प्रतिशत में 33 फीसद 27ः 6 वोट वाम मोर्चे और कांग्रेस का था अबकी बार वाम मोर्चा और कांग्रेस साथ-साथ हैं लेकिन फिर भी आमना-सामना ममता की टी.एम.सी और भाजपा का ही है। बहरहाल भाजपा के क्षत्रपों का मानना है कि बंगाल में परिवर्तन की बयार चल रही है किसी चेहरे को सामने लाने का औचित्य ही नहीं है लेकिन दूसरी तरफ ममता हैं जिन्होंने अपने अकेले दम पर 30 सालों से काबिज कम्युनिस्ट पार्टी को बाहर का रास्ता दिखाकर सत्ता का सिंहासन हासिल किया वो भी ममता का परिवर्तन नारा था ऐसे में भाजपा भी ममता को हलके मे नहीं लेना चाह रही होगी अब एक ही सवाल अन्र्तमन में घूम रहा है कि दीदी के खिलाफ किस हस्ती को आगे बढ़ायेगी या हमेशा की तरह मोदी नाम के सहारे बंगाल की चुनावी वैतरणी पार कर जायेगी ये तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे फिलहाल ममता के किले को भागवाधारियों ने घेर लिया है इसमें कोई दो राय नहीं है। Sources:Saleem raza